‘गर्म, ताज़ा, अच्छा खाना’: दिल्ली पुलिस ने बताया की कैसे उसने 10 अक्टूबर को हिरासत में प्रदर्शनकारियों का ख्याल रखा

Delhi Protest: दिल्ली पुलिस ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 10 अक्टूबर को दिल्ली में इलेक्शन कमीशन ऑफ़ इंडिया (ECI) के खिलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए लोगों को खाना, चाय, कॉफ़ी और दूसरी खाने-पीने की चीज़ें दी गईं और उन्हें जेल में नहीं रखा गया.
एक एफिडेविट में पुलिस ने कहा कि हिरासत में लिए गए नेताओं को पुलिस स्टेशन ऑफिस में रखा गया था.
दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित करने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का कथित रूप से पालन न करने पर अवमानना कार्यवाही के जवाब में दायर एक जवाबी हलफनामे में ये दावे किए.

कैदियों को कुछ ही घंटों में रिहा कर दिया गया, ताज़ा खाना दिया गया

पुलिस ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को कुछ ही घंटों में रिहा कर दिया गया, जो संबंधित नियमों के तहत तय ज़्यादा से ज़्यादा 24 घंटे के समय से पहले था; उन्हें पुलिस लॉक-अप या जेल में नहीं रखा गया, उन्हें खाना दिया गया और जब उन्हें हटाने की ज़रूरत वाले हालात खत्म हो गए तो उन्हें जाने दिया गया.
जंतर-मंतर पर CJP के CEC विरोधी प्रदर्शन की इजाज़त न देने के कदम का बचाव करते हुए, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने कथित तौर पर कहा कि लोगों को दिल्ली पुलिस एक्ट के सेक्शन 65 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के सेक्शन 172 के तहत तभी हटाया गया जब सेक्शन 163 के आदेश लागू थे.
एफिडेविट में आगे कहा गया है कि हटाए गए लोगों को “अस्थायी सेंटर” में रखा गया, “गर्म, ताज़ा और अच्छा खाना” दिया गया और दो से छह घंटे में जाने दिया गया. बार एंड बेंच की रिपोर्ट में कमिश्नर के हवाले से कहा गया कि नेताओं को SHO के चैंबर में बैठाया गया और उन्हें “चाय, कॉफ़ी, खाना और दूसरी चीज़ें” दी गईं.

Delhi Protest: दिल्ली पुलिस का कहना है कि बड़ी अशांति को रोका गया

दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा है कि CEC के खिलाफ प्रदर्शन से पहले बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लेने से ‘बड़ी पब्लिक ऑर्डर की स्थिति’ को टालने में मदद मिली.
एफिडेविट में कहा गया, “दिल्ली पुलिस द्वारा समय पर, सही और कानूनी कदम उठाए जाने से एक बड़ी पब्लिक ऑर्डर की स्थिति टल गई.”
कमिश्नर कुमार ने हिरासत को “कानून और व्यवस्था बनाए रखने और लोगों और संपत्ति को नुकसान से बचाने के सही मकसद के हिसाब से” बताया, और कहा कि पुलिस ऐसे संगठन को पब्लिक ऑर्डर तोड़ने की इजाज़त नहीं दे सकती थी जिसका हालिया इतिहास ‘भीड़ की हिंसा, संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और कई लोगों को घायल करने वाली घटनाओं’ का रहा हो, उन्होंने 20 जुलाई को NEET परीक्षा विवाद के दौरान जंतर-मंतर पर हुई झड़पों का ज़िक्र किया.

दिल्ली पुलिस ने बताया 10 अक्तूबर के प्रदर्शन को क्यों नहीं दी गई इजाजत

पुलिस कमिश्नर ने NEET-UG पेपर लीक को लेकर CJP के 20 जुलाई के मार्च को “अनऑथराइज़्ड, गैर-कानूनी और गैर-कानूनी” बताया. पुलिस ने दलील दी है कि पिछले मार्च में शामिल लोग एक गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा थे, और 10 अक्टूबर को हुई भीड़ के खिलाफ की गई कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की.
कमिश्नर ने CJP द्वारा पुलिस के निर्देशों और पब्लिक प्रदर्शनों के लिए लगाई गई शर्तों को बार-बार नज़रअंदाज़ करने का हवाला देकर पाबंदियों को सही ठहराने की कोशिश की. एफिडेविट में कहा गया है कि संगठन ने जून में पहले के विरोध प्रदर्शन के लिए एक लिखित अंडरटेकिंग दी थी, जिसमें यह भरोसा भी था कि जमावड़ा शांतिपूर्ण रहेगा, इसमें 1,000 से ज़्यादा लोग नहीं होंगे और बिना पहले से इजाज़त के पार्लियामेंट की ओर मार्च नहीं होगा.
पुलिस ने आरोप लगाया कि बाद में अंडरटेकिंग तोड़ी गई और संगठन ने बाद में 20 जुलाई को पार्लियामेंट की ओर एक अनऑथराइज़्ड मार्च के लिए लोगों को इकट्ठा किया. एफिडेविट के मुताबिक, जुलाई के इवेंट से जुड़े इन आरोपों की वजह से पुलिस ने 10 अक्टूबर के जमावड़े की इजाज़त देने से मना कर दिया.

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