मिडिल ईस्ट पर मतभेद, BRICS में आम सहमति मुश्किल; भारत ने फलस्तीन का किया समर्थन

नई दिल्ली | मिडिल-ईस्ट (पश्चिम एशिया) में जारी भीषण संघर्ष को लेकर ब्रिक्स देशों की महत्वपूर्ण बैठक बिना किसी 'संयुक्त घोषणापत्र' के समाप्त हो गई। सदस्य देशों के बीच गहराते कूटनीतिक मतभेदों के कारण किसी एक साझा दस्तावेज पर मुहर नहीं लग सकी। वर्तमान में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहे भारत के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण रही, क्योंकि कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद सदस्यों के रुख में एकरूपता नहीं दिखी।

आम सहमति में 'सऊदी-यूएई' और 'ईरान' के बीच फंसा पेंच

भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, बैठक में सर्वसम्मति न बन पाने की मुख्य वजह नए सदस्य देशों और पुराने सदस्यों के अलग-अलग रणनीतिक हित रहे:

  • ईरान का रुख: ईरान चाहता था कि ब्रिक्स देश अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एक सख्त और एकजुट रुख अपनाएं। उसने इसके लिए भारत से मध्यस्थता का आग्रह भी किया था।

  • सऊदी अरब और UAE की भूमिका: ब्रिक्स में शामिल हुए इन नए अरब देशों की मौजूदगी और उनके अपने स्वतंत्र कूटनीतिक हितों के चलते किसी भी ऐसे बयान पर सहमति नहीं बन सकी, जो एकपक्षीय या अत्यधिक सख्त हो।

संयुक्त बयान की जगह 'अध्यक्ष का बयान' (Chair’s Statement)

जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सभी सदस्य देशों के हस्ताक्षर वाला 'संयुक्त बयान' जारी नहीं हो पाता, तो केवल मेजबान देश की ओर से 'अध्यक्ष का बयान' जारी किया जाता है। इस बयान की मुख्य बातें:

  • गहरी चिंता: सभी सदस्यों ने मिडिल-ईस्ट में बढ़ती हिंसा पर चिंता जताई।

  • प्रमुख मुद्दे: चर्चा में गाजा की मानवीय स्थिति, फलस्तीन का मुद्दा, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी UNRWA की भूमिका और आतंकवाद के प्रति 'जीरो-टॉलरेंस' की नीति पर जोर दिया गया।

  • स्वागत: लेबनान में हाल ही में हुए संघर्ष-विराम का सभी देशों ने स्वागत किया।

भारत की अगली बड़ी परीक्षा

ब्रिक्स की अध्यक्षता के नाते भारत अगले महीने विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी करने जा रहा है। इसके बाद साल के अंत में 'ब्रिक्स शिखर सम्मेलन' का भव्य आयोजन होना है। रूस-यूक्रेन युद्ध और अब मिडिल-ईस्ट संकट ने ब्रिक्स के भीतर आंतरिक खींचतान बढ़ा दी है। ऐसे में भारत के सामने अगले सम्मेलनों में एक साझा मंच तैयार करने की बड़ी जिम्मेदारी होगी।

Latest news

Related news