अरावली मामले पर CJI का कड़ा रुख, बोले- ‘क्या मेरे रिटायरमेंट का इंतजार है?’

नई दिल्ली। अरावली पर्वतमाला और पहाड़ियों की वैधानिक परिभाषा व संरक्षण के संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने मामले पर गठित पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति की 6 महीने का अतिरिक्त समय मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने के लिए 30 नवंबर तक की अंतिम मोहलत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसके बाद कोई अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा और कार्य पूरा करने के लिए समिति को जरूरत पड़ने पर दिन-रात जुटना होगा।

सीजेआई की दो टूक: 'मेरी सेवानिवृत्ति तक टालने की मांग'

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ ने समिति की ओर से 28 फरवरी 2027 तक समय सीमा बढ़ाने के अनुरोध पर नाराजगी जताई। समिति की पूर्व निर्धारित समयसीमा 31 अगस्त को ही समाप्त हो चुकी थी। अतिरिक्त समय की मांग पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "समिति ने मूल रूप से मेरी सेवानिवृत्ति तक मामले को स्थगित करने की मांग की है।"

पीठ ने चेतावनी दी कि यदि समिति निर्धारित समयसीमा में काम पूरा करने में असमर्थ रहती है, तो अदालत इसके पुनर्गठन पर विचार करने के लिए बाध्य होगी।

दिन-रात काम करने और व्यापक विचार-विमर्श के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने समिति को 30 नवंबर तक हर हाल में अंतिम निष्कर्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि वैज्ञानिक और नीतिगत सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले समिति को राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों, किसानों, पर्यावरणविदों और खदान श्रमिकों सहित सभी हितधारकों के साथ प्रभावी व व्यापक परामर्श प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

अंतरिम नहीं, अंतिम रिपोर्ट लेकर आए समिति

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और समिति का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि प्रभावित पक्षों और स्थानीय समुदायों को सुनने के लिए अभी सीमित अवसर मिला है, इसलिए व्यापक रिपोर्ट हेतु 28 फरवरी 2027 तक का समय जरूरी है। उन्होंने यह भी बताया कि एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार कर ली गई है।

इस पर पीठ ने दो टूक कहा कि अदालत केवल अंतरिम रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होगी, समिति को सीधे अंतिम रिपोर्ट पेश करनी चाहिए। हालांकि, अरावली से जुड़े किसी अत्यावश्यक मुद्दे पर अदालत के तुरंत हस्तक्षेप के लिए अंतरिम बिंदु प्रस्तुत करने की छूट दी गई है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को तय की गई है।

समिति का गठन और 100 मीटर ऊंचाई की परिभाषा पर विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने जून माह में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के महानिदेशक की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस समिति को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की वैज्ञानिक परिभाषा, सीमांकन और पर्यावरणीय-पारिस्थितिक प्रभावों का समग्र अध्ययन कर 31 अगस्त तक रिपोर्ट देने का जिम्मा सौंपा गया था।

यह पूरा मामला अरावली की परिभाषा से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट की स्वतः संज्ञान कार्यवाही से संबंधित है। पूर्व में एक संशोधित परिभाषा के तहत केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भू-भागों को ही अरावली पहाड़ी मानने का प्रस्ताव था। इस पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने गंभीर चिंता जताई थी कि इस मानक से अरावली के विशाल और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिस्से कानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे और खनन माफिया को लाभ पहुंचेगा। इसी कारण शीर्ष अदालत ने संशोधित परिभाषा पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने और विशेषज्ञ समिति से समग्र वैज्ञानिक आकलन कराने का निर्देश दिया था।

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