हरियाणा में बदल रही है परिवार की परिभाषा: ‘हम दो हमारे दो’ के बजाय ‘हम दो हमारा एक’ की ओर बढ़ा रुझान

चंडीगढ़ | बदलती जीवनशैली, बढ़ती उच्च शिक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं के चलते हरियाणा के पारंपरिक बड़े परिवारों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। कभी 'हम दो हमारे दो' के नारे पर चलने वाले इस समाज में अब 'हम दो हमारा एक' की नई सोच जगह ले रही है, जिसके कारण घरों में बच्चों की संख्या लगातार कम हो रही है। सूबे की नई पीढ़ी अब परिवार नियोजन को अपनी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रख रही है। यही कारण है कि हरियाणा की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट – टीएफआर) अब गिरकर 1.9 के स्तर पर आ गई है। यह बदलाव केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य के एक बिल्कुल नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।

प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंची दर, शहरों ने पेश की नई मिसाल

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक, हरियाणा में एक महिला अपने पूरे प्रजनन काल के दौरान औसतन केवल 1.9 बच्चों को जन्म दे रही है। यह आंकड़ा जनसंख्या को स्थिर रखने वाले जरूरी 'प्रतिस्थापन स्तर' (रिप्लेसमेंट लेवल) यानी 2.1 से भी काफी नीचे चला गया है। प्रतिस्थापन स्तर वह सीमा होती है, जिससे एक पीढ़ी की आबादी अगली पीढ़ी में खुद का संतुलन बनाए रखती है; इसके नीचे जाने का सीधा मतलब यह है कि आने वाले सालों में राज्य की जनसंख्या वृद्धि की गति काफी धीमी पड़ जाएगी। इस सामाजिक बदलाव में शहरों की भूमिका सबसे आगे रही है, जहां शहरी क्षेत्रों में टीएफआर घटकर मात्र 1.6 रह गया है, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह अभी 2.0 पर बना हुआ है।

पिछले 12 वर्षों में परिवारों के गणित में दर्ज हुई 13.6 फीसदी की गिरावट

यदि पिछले 12 सालों के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाए, तो यह बदलाव बेहद चौंकाने वाला और साफ नजर आता है। वर्ष 2012-14 के दौरान हरियाणा की कुल प्रजनन दर जहां 2.2 थी, वहीं अब इसमें करीब 13.6 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी आई है। इस दौरान गांवों में यह दर 2.3 से घटकर 2.1 हुई है, जबकि शहरों में 2.0 से गिरकर 1.7 तक पहुंच गई है। इस बड़ी गिरावट के साथ ही हरियाणा अब 1.9 के राष्ट्रीय औसत के बिल्कुल बराबर खड़ा हो गया है। हालांकि, ग्रामीण हरियाणा की प्रजनन दर देश के शहरी औसत (1.5) से अभी भी कुछ ऊपर बनी हुई है, लेकिन हरियाणा के शहर राष्ट्रीय शहरी सूचकांक के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।

दूरगामी प्रभाव: बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और विकास की रफ्तार पर होगा असर

सामाजिक और जनसांख्यिकीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, प्रजनन दर में इस कमी के पीछे महिलाओं का बढ़ता साक्षरता स्तर, उनका नौकरीपेशा होना और परिवार नियोजन के आधुनिक साधनों की आसान उपलब्धता सबसे प्रमुख वजहें हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि टीएफआर इसी तरह 2.1 से नीचे बना रहा, तो इसका सीधा असर अगले 20 से 25 सालों में दिखाई देने लगेगा। जब दुनिया छोड़ने वाले लोगों के मुकाबले जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या कम होगी, तो कुल आबादी घटने लगेगी। इसके परिणामस्वरूप कार्यबल (वर्किंग पापुलेशन) में कमी आएगी, बुजुर्गों की आबादी का अनुपात बढ़ेगा और अंततः विकास की आर्थिक गति भी धीमी हो सकती है, जिससे भविष्य में अन्य राज्यों से पलायन (माइग्रेशन) बढ़ने की पूरी संभावना रहेगी।

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