नई दिल्ली। मौजूदा दौर में अनियंत्रित जीवनशैली और लगातार बढ़ती गंभीर बीमारियों के मद्देनजर स्वास्थ्य बीमा (हेल्थ इंश्योरेंस) सुरक्षा लेना बेहद अनिवार्य हो चुका है। विशेषकर वैश्विक कोरोना महामारी के बाद से आम नागरिकों के बीच चिकित्सा बीमा कराने के प्रति जागरूकता में भारी इजाफा देखा गया है। अस्पतालों के अत्यधिक महंगे इलाज और भारी-भरकम खर्चों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए लोग अपनी जेब से मोटा प्रीमियम भरकर इन नीतियों को खरीद रहे हैं। हालांकि, दूसरी तरफ बीमा प्रदाता कंपनियां भी प्रतिवर्ष प्रीमियम की दरों में बेतहाशा बढ़ोतरी कर रही हैं। इतनी महंगी किश्तों का भुगतान करने के बाद भी वर्तमान में एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है, जहां बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को जरूरत के समय क्लेम (दावा राशि) हासिल नहीं हो पा रहा है। हाल ही में जारी एक आधिकारिक वित्तीय रिपोर्ट के चौंकाने वाले विश्लेषण के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 (FY25) के दौरान देश में किए गए प्रत्येक 12 स्वास्थ्य दावों में से औसतन एक क्लेम को बीमा कंपनियों द्वारा पूरी तरह से खारिज (रिजेक्ट) कर दिया गया, जिसने इस क्षेत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
करोड़ों दावों का पंजीकरण, अरबों का भुगतान और खारिज होने का बड़ा अनुपात
सांख्यिकीय आंकड़ों की गहराई से पड़ताल करें, तो बीते वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान पूरे देश में पॉलिसीधारकों की तरफ से बीमा कंपनियों के समक्ष कुल 3.26 करोड़ स्वास्थ्य बीमा दावे प्रस्तुत किए गए थे। इन पंजीकृत दावों के एवज में विभिन्न कंपनियों द्वारा कुल मिलाकर 94,248 करोड़ रुपये की विशाल राशि का क्लेम भुगतान भी सेटल किया गया। इसके बावजूद, कुल आवेदनों में से तकरीबन 8 प्रतिशत क्लेम को सीधे तौर पर अमान्य घोषित कर निरस्त कर दिया गया। इस गणितीय अनुपात का सीधा और कड़वा अर्थ यह है कि समय पर प्रीमियम जमा करने वाले प्रत्येक 12 पॉलिसीधारकों में से कम से कम एक अभागे उपभोक्ता को अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई और उन्हें अपनी गाढ़ी कमाई से ही पूरा बिल चुकाना पड़ा।
नियामक संस्था आईआरडीएआई का कड़ा रुख और रिजेक्शन के पारदर्शी कारण की अनिवार्यता
पॉलिसीधारकों के साथ हो रहे इस कथित अन्याय और बढ़ती शिकायतों का संज्ञान लेते हुए देश की सर्वोच्च बीमा नियामक संस्था, भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने अब बेहद कड़ा और सुधारात्मक कदम उठाया है। नियामक द्वारा जारी नए कानूनी दिशानिर्देशों के तहत यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया है कि अब कोई भी इंश्योरेंस कंपनी किसी उपभोक्ता का क्लेम अपनी मर्जी से हवा में रिजेक्ट नहीं कर पाएगी। यदि कोई कंपनी किसी दावे को खारिज करती है, तो उसे उसके पीछे का एक बेहद ठोस, तार्किक और विधिक कारण लिखित रूप में अनिवार्य रूप से स्पष्ट करना होगा। इसके साथ ही, बीमा प्रदाता को अपनी मूल पॉलिसी बुकलेट की उन विशिष्ट नियम व शर्तों (क्लॉज) का साफ तौर पर उल्लेख करना होगा, जिनके आधार पर क्लेम न देने का निर्णय लिया गया है। यह सख्त नियम ऐसे समय में लागू किया गया है जब कंपनियों द्वारा क्लेम प्रोसेसिंग की तकनीकी स्पीड बढ़ाने के दावों के बावजूद उपभोक्ताओं की शिकायतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।
पॉलिसीधारकों को कानूनी संबल, कैशलेस अप्रूवल और डिस्चार्ज की समय-सीमा तय
इस नए प्रशासनिक सुधार के लागू होने से सीधे तौर पर आम पॉलिसीधारकों को एक बड़ा कानूनी और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होगा। अब उपभोक्ताओं के लिए यह समझना बेहद आसान हो जाएगा कि कंपनी द्वारा उनके दावे को खारिज करने का फैसला नियमानुसार सही है अथवा उनके साथ कोई धोखाधड़ी की गई है। यदि उपभोक्ता कंपनी के तर्क से असंतुष्ट रहता है, तो वह इन लिखित आधारों को ढाल बनाकर उपभोक्ता निवारण मंचों, शिकायत निवारण सेल अथवा सीधे 'बीमा लोकपाल' (इंश्योरेंस ओम्बड्समैन) की शरण में जाकर अपने हक की कानूनी लड़ाई लड़ सकेगा। इसके अतिरिक्त, नियामक ने मरीजों को मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए समय-सीमा भी निर्धारित कर दी है। अब सभी कंपनियों के लिए अस्पतालों से मिलने वाले कैशलेस प्री-ऑथराइजेशन अनुरोधों को अधिकतम एक घंटे के भीतर प्रोसेस करना अनिवार्य होगा, साथ ही मरीज के ठीक होने पर अस्पताल से फाइनल बिल मिलने के महज तीन घंटे के भीतर डिस्चार्ज संबंधी अंतिम वित्तीय निर्णय की सूचना देना भी कानूनी रूप से बाध्यकारी बना दिया गया है।

