Akhilesh Yadav on Election Commission लखनऊ: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कन्नौज से सांसद अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग को लेकर सामने आई रिपोर्ट पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू के बीच चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ मुद्दों पर मतभेद थे.
अखिलेश यादव ने इसी मुद्दे को लेकर निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और केंद्र सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि सरकार हर स्तर पर मनमानी कर रही है और कानून, संविधान तथा नियमों को दरकिनार करने की कोशिश की जा रही है.
ये एक बेहद गंभीर समाचार है कि पिछले 10 महीनों में 2 चुनाव आयुक्तों ने निर्वाचन आयोग के गलत निर्णयों पर 14 बार अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई है।
इसका सीधा मतलब ये है कि सभी चुनाव आयुक्त अपना सही काम नहीं कर पा रहे हैं। एक स्वतंत्र निकाय के सदस्यों को अगर न्यायपूर्ण कार्य करने की… pic.twitter.com/UoQnYWsWd8
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) September 23, 2026
Akhilesh Yadav on Election Commission:’SIR के नाम पर विपक्ष के वोट काटे गए’
अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि Special Intensive Revision (SIR) के नाम पर विपक्ष से जुड़े मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. निर्वाचन आयोग से निष्पक्षता की उम्मीद थी,लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
सपा प्रमुख के मुताबिक, उन्होंने पहले भी आरोप लगाया था कि समाजवादी पार्टी के समर्थक मतदाताओं को चिन्हित कर उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश हुई. उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में शिकायत और लिखित जानकारी देने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई.
हालांकि, SIR को लेकर निर्वाचन आयोग का कहना है कि मतदाता सूची से संबंधित फैसले नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए हैं. पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं को लेकर भी बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल हुई हैं और इस प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.
‘चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रह गया’
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आयोग आखिर किसके इशारे पर काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि अगर आयोग के भीतर ही अधिकारियों के बीच फैसलों को लेकर आपत्तियां सामने आ रही हैं तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
उन्होंने कथित आंतरिक मतभेदों की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अगर अन्य चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसलों को स्वीकार नहीं किया, तो इससे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं.
दरअसल, द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की. रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता नाम हटाने और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं.
निर्वाचन आयोग ने दी अलग सफाई
इस बीच इस रिपोर्ट के बाद निर्वाचन आयोग की ओर से सफाई भी सामने आई है. EC सूत्रों ने कहा कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और फैसलों में सर्वसम्मति रही.
निर्वाचन आयोग के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाने और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे विषयों पर मुद्दे जरूर उठाए थे, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आयोग के फैसले असहमति के आधार पर लिए गए.
यानी एक तरफ मीडिया रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों का हवाला देते हुए आयोग के भीतर मतभेद की बात सामने आई है, जबकि आयोग के सूत्र फैसलों को सर्वसम्मत बता रहे हैं. यही विरोधाभास फिलहाल पूरे विवाद का अहम हिस्सा है.
‘लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाईं’
अखिलेश यादव ने अपने बयान में आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका कमजोर की जा रही है. उन्होंने कहा कि सरकार में बने रहने के लिए संवैधानिक संस्थाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.
उन्होंने पिछले चुनावों और उपचुनावों का जिक्र करते हुए भी निर्वाचन प्रक्रिया पर सवाल उठाए. अखिलेश ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश के उपचुनावों से लेकर पश्चिम बंगाल के चुनाव तक विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं.
उन्होंने पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का भी उल्लेख करते हुए चुनाव प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए. ये आरोप अखिलेश यादव के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं; इनके संबंध में अलग-अलग पक्षों और निर्वाचन आयोग के जवाब को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
14 आपत्तियों की रिपोर्ट से क्यों बढ़ा विवाद?
इस पूरे विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट से हुई जिसमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने के दौरान 14 मौकों पर आयोग के फैसलों पर आपत्ति दर्ज की. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने फैसलों को उनकी जानकारी या सहमति के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए.
रिपोर्ट में Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है. इन आरोपों और आपत्तियों पर निर्वाचन आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे.
ऐसे में अब राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाओं के साथ-साथ यह विवाद निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और SIR की प्रक्रिया को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है.
अखिलेश ने सुप्रीम कोर्ट से भी हस्तक्षेप की मांग की
अखिलेश यादव ने इस पूरे घटनाक्रम पर सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग भी की है. विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए हैं.

