Muria Darbar Bastar रायपुर: छत्तीसगढ़ के दो दिवसीय दौरे पर पहुंची राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक ‘मुरिया दरबार’ में शामिल हुईं. इस भव्य आयोजन के साथ ही बस्तर दशहरा का समापन हो गया है.
बस्तर दशहरा कार्यक्रम, लालबाग मैदान, जगदलपुर https://t.co/v68HI7MAq7
— Vishnu Deo Sai (@vishnudsai) October 23, 2026
इस समारोह के दौरान लोगों को संबोधित करते हुए महामहिम राष्ट्रपति ने अपनी तुलना देश के एक आम नागरिक के रुप में करते हुए कहा कि ‘मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी भी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे। मैं भी एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं.’
मेरे दादाजी मांझी थे, मेरे पिताजी भी मांझी थे और मेरे भाई भी मांझी हुआ करते थे। मैं भी एक मांझी की बेटी हूं, गांव के मुखिया की बेटी हूं।
-माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी
📍मुरिया दरबार, सिरहासार भवन, जगदलपुर – बस्तर
@rashtrapatibhvn
#बस्तर_दशहरा_2026 #मुरिया_दरबार
— Vishnu Deo Sai (@vishnudsai) October 23, 2026
राष्ट्रपति के इस दौरे के बाद देश भर में मुरिया दरबार को लेकर लोगों के मन में खासी उत्सुकता बढ़ गई है. हर कोई यह जानना चाहता है कि आखिर मुरिया दरबार क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसका इतिहास क्या है?
क्या है मुरिया दरबार और इसका इतिहास?
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण और अनोखी रस्मों में से एक है, जिसे आदिवासियों की अपनी एक ‘संसद’ कहा जाता है. यह परंपरा आजादी के पहले से चली आ रही है, जब देश में राजशाही का दौर हुआ करता था.
ऐतिहासिक परंपरा के मुताबिक, इस दरबार के दिन राजा अपनी शाही पोशाक त्यागकर साधारण कपड़े पहनते थे और जमीन पर बैठकर बस्तर संभाग की मुरिया जनजाति की समस्याओं को सुनते थे. ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि आम जनता बिना किसी झिझक के अपनी बात और अपनी फरियाद सीधे राजा तक पहुंचा सके.
लोकतंत्र में बदल गया इस दरबार का स्वरूप
देश को आजादी मिलने और लोकतंत्र आने के बाद भी मुरिया आदिवासियों की यह गौरवशाली परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ कायम है, हालांकि इसका स्वरूप जरूर बदला है. अब राजशाही खत्म होने के बाद इस दरबार का मुखिया कोई वंशानुगत राजा नहीं, बल्कि देश के राष्ट्रपति होते हैं.
चूंकि छत्तीसगढ़ की प्रमुख आदिवासी जनजातियां जैसे बैगा, कोरवा, पंडो और मुरिया राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाते हैं, इसलिए राष्ट्रपति स्वयं समय-समय पर उनकी फरियाद सुनते हैं. राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में यह जिम्मेदारी राज्य के मुख्यमंत्री संभालते हैं.
उल्लेखनीय है कि बीते 15 अगस्त 2026 को बस्तर के आदिवासियों ने दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन पहुंचकर राष्ट्रपति मुर्मू को मुरिया दरबार में शामिल होने का आधिकारिक न्यौता दिया था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया था. बस्तर की इस 600 साल पुरानी समृद्ध परंपरा को गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली की कर्तव्य पथ पर झांकी के रूप में भी प्रदर्शित किया जा चुका है.
कौन हैं मुरिया जनजाति?
मुरिया जनजाति मूल रूप से गोंड जनजाति की एक प्रमुख उपशाखा और द्रविड़ समुदाय का हिस्सा है. यह मुख्य रूप से तीन उप-वर्गों—राजा मुरिया, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया में बंटी हुई है.
छत्तीसगढ़ में यह जनजाति मुख्य रूप से बस्तर संभाग के जगदलपुर, कोंडागांव, बीजापुर, नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिलों में निवास करती है. इसके अलावा, इनकी आबादी छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सीमावर्ती इलाकों में भी पाई जाती है.

