नई दिल्ली। बैंकिंग सेक्टर में काम का बढ़ता दबाव अब सिर्फ कर्मचारियों की परेशानी का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य और कार्यस्थल के माहौल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इंडियन बैंक के हेड ऑफिस में आईटी डिवीजन के चीफ मैनेजर कनिष्क बाजपेयी की शनिवार शाम चौथी मंजिल से कूदकर मौत के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि बैंक कर्मचारियों पर बढ़ता काम का दबाव किस हद तक पहुंच चुका है। यह बैंकिंग सेक्टर से जुड़ा कोई पहला ऐसा मामला नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या के कई मामले सामने आए हैं, जिनमें वर्क प्रेशर, टारगेट, वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव, उत्पीडऩ और नौकरी से जुड़ी दूसरी परेशानियों का जिक्र हुआ है।
फरवरी 2026 में राज्यसभा में सीपीआई(एम) सांसद एए रहीम ने दावा किया था कि पिछले एक दशक में देशभर में करीब 500 बैंक कर्मचारी वर्क रिलेटेड स्ट्रेस, उत्पीडऩ और वर्कप्लेस इश्यूज के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। हालांकि यह आंकड़ा सरकार का आधिकारिक ऑल इंडिया डेटाबेस नहीं है, बल्कि संसद में रखा गया दावा है। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में बैंक कर्मचारियों की आत्महत्याओं का ऐसा साल-दर-साल, बैंकवार और कारणवार समेकित डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। यही इस पूरे मुद्दे की सबसे बड़ी चुनौती भी है-मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन समस्या की पूरी तस्वीर आंकड़ों में साफ दिखाई नहीं देती।
किन वजहों से बढ़ रहा दबाव?
बैंक कर्मचारियों से जुड़े अलग-अलग मामलों को देखें तो दबाव के कई स्तर सामने आते हैं। पहला है टारगेट प्रेशर। बैंकिंग में लोन डिस्बर्समेंट, रिकवरी, डिपॉजिट, इंश्योरेंस, क्रेडिट कार्ड और दूसरे बिजनेस टारगेट पूरे करने का दबाव लगातार बढ़ा है। कर्मचारियों पर सिर्फ काम पूरा करने की नहीं, बल्कि निर्धारित लक्ष्य हासिल करने की जिम्मेदारी रहती है। दूसरा है वर्कलोड। कर्मचारियों की संख्या कम होने पर एक कर्मचारी को कई लोगों का काम संभालना पड़ता है। लंबे समय तक काम करने और छुट्टी के बाद भी काम से जुड़े रहने की शिकायतें इसी दबाव को बढ़ाती हैं। तीसरा है वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव। कुछ मामलों में कर्मचारियों या उनके परिवारों की ओर से अपमान, धमकी, उत्पीडऩ या अनुचित दबाव के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि हर आत्महत्या को केवल कार्यस्थल के दबाव से जोडऩा सही नहीं होगा। व्यक्तिगत, पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। चौथा है नौकरी की असुरक्षा। निजी बैंकिंग और कुछ वित्तीय संस्थानों में प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन, लक्ष्य और नौकरी को लेकर चिंता कर्मचारियों के तनाव को बढ़ा सकती है।
स्टाफ कम, काम लगातार बढ़ा
बैंक कर्मचारियों के संगठनों की ओर से लंबे समय से स्टाफ की कमी का मुद्दा उठाया जाता रहा है। राज्यसभा में रहीम ने लोकसभा में दिए आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया था कि जून 2025 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में करीब 32,547 पद खाली थे। इसका सीधा असर शाखाओं और मौजूदा कर्मचारियों पर पड़ता है। बैंकिंग कारोबार बढऩे के साथ यदि कर्मचारियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो अतिरिक्त काम मौजूदा स्टाफ पर आता है। यही वजह है कि बैंक यूनियनें स्टाफ की कमी को बढ़ते वर्कलोड और टारगेट प्रेशर से जोड़ती रही हैं।

