नई दिल्ली। शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने न्यायपालिका और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को लेकर दिए गए अपने विवादित बयानों पर शीर्ष अदालत से बिना शर्त माफी मांग ली है। सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत अपने हलफनामे में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मकसद कभी भी अदालत की स्वतंत्रता, गरिमा या न्यायिक अधिकार को चोट पहुँचाना नहीं था। सुनवाई के दौरान माफीनामा आधिकारिक रिकॉर्ड पर मौजूद न होने और उनकी तरफ से किसी वकील के उपस्थित न होने पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी की। इसके बाद शीर्ष अदालत ने संजय राउत को 17 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के समक्ष हाजिर होने का कड़ा निर्देश जारी किया है। उसी दिन अदालत उनकी माफी याचिका पर विचार कर आगामी फैसला सुनाएगी।
हलफनामे के जरिए बिना शर्त माफी की गुहार
संजय राउत ने उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत अपने हलफनामे में कहा कि वे न्यायपालिका की गरिमा, स्वायत्तता और सर्वोच्च स्थान का पूरा सम्मान करते हैं। उन्होंने अपने रुख को साफ करते हुए कहा कि उनका किसी भी रूप में अदालत की अवमानना करने या उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने का कोई इरादा नहीं था। अपने पूर्व बयानों पर गहरा अफसोस जताते हुए उन्होंने स्वेच्छा से, पूर्ण रूप से और बिना किसी शर्त के न्यायपालिका से क्षमा याचना की है।
विवादित बयानों पर जताया गहरा खेद
अपने लिखित जवाब में राज्यसभा सांसद ने स्वीकार किया कि उनके कुछ बयान बिना सही तथ्यों की जांच और आवश्यक सतर्कता के दिए गए थे, जिससे न्यायपालिका पर अनुचित सवाल खड़े होने की स्थिति बनी। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका ध्येय कभी भी शीर्ष अदालत की साख को ठेस पहुँचाना, उसके अधिकारों को सीमित करना या किसी भी न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाना नहीं था।
भविष्य में पूरी सतर्कता और संयम बरतने का भरोसा
अदालत को आश्वस्त करते हुए संजय राउत ने कहा कि वे भविष्य में न्यायपालिका या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े किसी भी सार्वजनिक मंच पर बयानबाजी करते समय पूरी गंभीरता, सावधानी और संयम का पालन करेंगे। इसके अलावा उन्होंने यह भी प्रतिबद्धता जताई कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण या अदालत से जुड़े तथ्यों पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले वे उनकी प्रामाणिकता की पूरी तरह पुष्टि करेंगे।

