लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से बढ़ती कटुता, नेताओं के बीच आपसी अविश्वास और आक्रामक आरोप-प्रत्यारोप के सिलसिले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक बयानबाजी का गिरता स्तर अब व्यक्तिगत हमलों, अमर्यादित भाषा के इस्तेमाल, जातिवादी प्रहारों और हिंसक टिप्पणियों तक जा पहुंचा है, जो अत्यंत दुखद है। बसपा प्रमुख ने सचेत किया कि इस प्रकार के आचरण से न केवल देश की साख और गरिमा प्रभावित हो रही है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति आम जनता के विश्वास को भी गहरा नुकसान पहुंच सकता है।
शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं से मर्यादा और परस्पर सम्मान बनाए रखने का आग्रह
बसपा सुप्रीमो ने जोर देकर कहा कि देश के शीर्ष संवैधानिक पदों और महत्वपूर्ण राजनीतिक जिम्मेदारियों को संभाल रहे नेताओं को एक-दूसरे के प्रति आपसी सम्मान की परंपरा को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि आपत्तिजनक, अमर्यादित और समाज में वैमनस्य फैलाने वाली विषैली राजनीति को किसी भी स्तर पर बढ़ावा देना उचित नहीं है। मायावती ने कहा कि संकीर्ण स्वार्थों और गरीब-विरोधी सोच से प्रेरित होकर की जा रही राजनीति के कारण यदि आम नागरिकों का लोकतांत्रिक संस्थाओं से भरोसा उठता है, तो यह स्थिति देश और जनहित के लिए बिल्कुल भी शुभ नहीं कही जा सकती।
आपसी खींचतान के बजाय महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी जैसी बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने की जरूरत
मायावती ने अपने बयान में रेखांकित किया कि प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार और चुनावी प्रक्रियाओं की पारदर्शिता को लेकर उठते सवालों के बीच नेताओं के आपसी टकराव से देश का राजनीतिक माहौल निरंतर दूषित हो रहा है। उन्होंने कहा कि देश की जनता नेताओं से यह अपेक्षा करती है कि वे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने के बजाय गरीबी, बेरोजगारी और बेकाबू महंगाई जैसी गंभीर एवं संवेदनशील समस्याओं के स्थायी समाधान तलाशने पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
नेताओं के बीच अशोभनीय बयानों की होड़ पर रोक और सार्वजनिक संवाद में गरिमा कायम रखने की अपील
बसपा प्रमुख ने चेतावनी दी कि विभिन्न राजनीतिक दलों और उनके प्रमुख नेताओं के बीच एक-दूसरे के विरुद्ध अशोभनीय टिप्पणियां करने की जो नई होड़ शुरू हुई है, वह देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण को और अधिक जहरीला बनाएगी। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों, उनके प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं से इस संवेदनशील विषय पर गंभीरता से मंथन करने तथा सार्वजनिक संवाद व भाषणों में भाषा की गरिमा एवं मर्यादा को बनाए रखने की पुरजोर अपील की।

