पेरिस। दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार फ्रांस में बड़े पैमाने पर होने वाले विरोध-प्रदर्शन अब एक आम बात बन गए हैं। आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतर स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधाओं के बाद भी सरकारी नीतियों के खिलाफ आम नागरिकों का गुस्सा लगातार सड़कों पर फूट रहा है। हाल ही में स्कूलों की बदहाली से भड़का छात्र आंदोलन अब महंगाई और व्यापक जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन का रूप ले चुका है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर फ्रांस में छोटी चिंगारी भी कैसे विशाल जन-आंदोलन में बदल जाती है।
आंदोलनों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें
इन विरोध-प्रदर्शनों के पीछे केवल तात्कालिक महंगाई ही नहीं, बल्कि गहरी आर्थिक मुश्किलें, सरकारी नीतियों से तकरार और राजनीतिक अस्थिरता भी मुख्य वजहें हैं। फ्रांस के नागरिकों में यह अटूट विश्वास है कि एकजुट होकर विरोध करने से सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया जा सकता है। मई 1968 का ऐतिहासिक छात्र आंदोलन, जिसमें 70 लाख से ज्यादा श्रमिक हड़ताल पर चले गए थे, और 1995 में पेंशन सुधारों के खिलाफ हुए देशव्यापी प्रदर्शन इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। हालांकि, हर बार सरकारें झुक जाएं, ऐसा भी जरूरी नहीं है।
आर्थिक विषमता और गरीबी का संकट
एक समृद्ध देश होने के बावजूद फ्रांस की एक बड़ी आबादी आज भी गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में लगभग 98 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रहे थे, जो कुल आबादी का 15.4 प्रतिशत हिस्सा है। देश में संपत्ति का वितरण भी बेहद असमान है; जहाँ सबसे अमीर 10 प्रतिशत परिवारों के पास कुल संपत्ति का लगभग आधा हिस्सा है, वहीं सबसे गरीब आधे परिवारों के पास इसका मात्र 7 प्रतिशत हिस्सा ही है। ऐसे में जब मकान का किराया, बिजली, भोजन और ईंधन के दाम आसमान छूते हैं, तो आम आदमी का बजट पूरी तरह चरमरा जाता है और उनके सामने सड़कों पर उतरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।
सरकारी फैसलों के खिलाफ जन-आक्रोश
सरकार के कई कड़े फैसले भी इस नाराजगी को हवा देने का काम करते हैं। पेंशन और रोजगार से जुड़े नियम सीधे तौर पर लोगों के भविष्य और आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। साल 2023 में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार द्वारा सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल किए जाने के फैसले के खिलाफ देश में भारी विरोध देखने को मिला था। जनता का मानना था कि इससे कर्मचारियों और परिवारों पर बेवजह का बोझ बढ़ेगा। वहीं, मौजूदा आंदोलन की शुरुआत स्कूलों की दयनीय स्थिति से हुई है। छात्रों और अभिभावकों का आरोप है कि शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी है, कक्षाएं ओवरक्राउडेड हैं और बुनियादी सुविधाओं का बुरा हाल है। हालांकि, देश का भारी-भरकम कर्ज (जो जीडीपी का 119 फीसदी है) सरकार के लिए शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं पर बड़ा बजट खर्च करने में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर सरकारें
फ्रांस की मौजूदा राजनीतिक उठापटक और अस्थिरता भी इन विरोध-प्रदर्शनों को लगातार बढ़ावा दे रही है। साल 2024 के संसदीय चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण संसद में महत्वपूर्ण नीतियों और बजट को पास कराना बेहद कठिन हो गया है। आए दिन अविश्वास प्रस्तावों के कारण सरकारों का गिरना और राजनीतिक दलों के बीच लगातार तनातनी इस बात की गवाही देती है। जब राजनीतिक स्थिरता कमजोर होती है और दल आम मुद्दों पर सहमति नहीं बना पाते, तो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम सेक्टर के फैसले लटक जाते हैं, जिससे जनता का असंतोष और अधिक उग्र हो जाता है।

