धमतरी। विजयदशमी के पावन पर्व पर पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है और रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा को हर्षोल्लास के साथ निभाया जाता है, किंतु छत्तीसगढ़ के धमतरी शहर में इस वर्ष दशहरे के पावन अवसर पर कुछ ऐसा देखने को मिला जिसने इस धार्मिक परंपरा और आस्था के मंच को हास्यास्पद बना दिया। धमतरी नगर निगम द्वारा इस बार जो पैंतालीस फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार करवाया गया था, उसकी अजीबोगरीब बनावट और बेढंगी शक्ल पूरे जिले ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा और उपहास का मुख्य विषय बन गई।
लाखों के बजट से बना रावण बना मज़ाक का पात्र
धमतरी नगर निगम द्वारा हर वर्ष इस भव्य आयोजन के लिए लाखों रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया जाता है। जनता के करों से वसूले गए पैसों से रावण का पुतला तो तैयार करवा लिया गया, लेकिन जब उसका चेहरा लोगों के सामने आया तो हर कोई हैरान रह गया। लंकापति रावण का यह पुतला अपनी पारंपरिक प्रतापी, अहंकारी या खूंखार मुद्रा में दिखने के बजाय बेहद लाचार, दयनीय और रोता हुआ सा प्रतीत हो रहा था। रावण की इस अजीबोगरीब और हास्यास्पद शक्ल को देखकर मौके पर मौजूद लोग दंग रह गए और जल्द ही इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं।
सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और जनता का आक्रोश
इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर धमतरी के इस अनोखे रावण की जमकर खिंचाई की गई और लोगों ने तरह-तरह के मजेदार व तीखे तंज कसे। किसी सोशल मीडिया यूजर ने इसे कुपोषण का शिकार बताया, तो किसी ने व्यंग्य करते हुए पंक्तियां लिखीं कि लंकापति रावण भी आजकल रो रहा है, बजट पूरा पास हुआ फिर भी ये क्यों रो रहा है। स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्धजनों ने सीधे तौर पर यह गंभीर आरोप लगाया है कि लाखों रुपये की लागत से तैयार होने वाला यह पुतला पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही, उदासीनता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है, जहां त्योहार के नाम पर केवल खानापूर्ति की गई है।
प्रशासनिक लीपापोती और गोलमोल जवाब
जब इस मामले को लेकर आम जनता का तीखा गुस्सा और विरोध सामने आने लगा, तो नगर निगम प्रबंधन ने अपनी कमियों पर पर्दा डालने और पल्ला झाड़ने का प्रयास शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण पर नगर निगम के उपायुक्त का अजीब तर्क सामने आया, जिसमें उनका कहना था कि रावण का निर्माण कार्य अनुबंध पर ठेकेदारों को सौंपा जाता है और उनके दावे के अनुसार पुतला ठीक-ठाक स्थिति में ही बनाया गया था। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली और गैर-जिम्मेदाराना बात यह सामने आई कि जनता के लाखों रुपये की लागत से तैयार हुए इस पुतला निर्माण पर कुल कितना सटीक खर्च आया है, इसकी पुख्ता जानकारी खुद जिम्मेदार अधिकारियों के पास भी मौजूद नहीं थी। अधिकारियों का यह कहना था कि जब संबंधित ठेकेदार अपना बिल पेश करेगा, तभी वास्तविक लागत स्पष्ट हो सकेगी। इस प्रकार के गैर-जिम्मेदाराना बयानों के बाद धमतरी की जागरूक जनता अब नगर निगम प्रशासन से सीधा सवाल कर रही है कि धार्मिक आस्थाओं और पावन पर्वों के नाम पर शासकीय धन की इस तरह की फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार का खेल आखिरकार कब बंद होगा।

