वॉशिंगटन। अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिलने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने घरेलू राजनीतिक मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि उनकी विदेश नीति पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी। भारत और अमेरिका के आपसी रिश्तों की बात करें तो इन चुनावी परिणामों का असर व्यापार, आयात शुल्क, रूस से तेल आयात, आव्रजन और रक्षा समझौतों जैसे तमाम अहम पहलुओं पर पड़ सकता है।
व्यापार नीति और टैरिफ पर बढ़ेगी संसद की निगरानी
अमेरिकी संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से ट्रंप प्रशासन के व्यापारिक निर्णयों पर पैनी नजर रखी जाएगी। सांसदगण टैरिफ नीतियों, भारत के साथ होने वाले संभावित व्यापारिक समझौतों और अमेरिकी कंपनियों पर पड़ने वाले असर को लेकर कड़े सवाल खड़े कर सकते हैं। इससे भारत को व्यापार वार्ताओं के दौरान कुछ हद तक राहत मिलने की उम्मीद तो है, लेकिन किसी बेहद आसान समझौते की कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि राष्ट्रपति के पास व्यापार और शुल्क से जुड़े कई कार्यकारी अधिकार आज भी सुरक्षित हैं। रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भी भारत को अमेरिकी दबाव का सामना करना जारी रह सकता है।
एच-1बी वीजा नियमों पर हो सकती है समीक्षा
भारतीय नागरिकों के लिए आव्रजन नीति हमेशा से एक संवेदनशील विषय रही है। ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा की फीस, पात्रता शर्तों और नियुक्ति प्रक्रिया के नियमों में काफी सख्ती की है। डेमोक्रेटिक सांसद अब इन प्रावधानों की गहराई से समीक्षा कर सकते हैं तथा अमेरिकी उद्योगों पर इनके प्रभावों को लेकर जनसुनवाई आयोजित कर सकते हैं। इससे अमेरिका में रोजगार के इच्छुक भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और युवाओं के भविष्य को लेकर एक नई बहस शुरू हो सकती है।
रक्षा सहयोग रहेगा मजबूत, रणनीतिक साझेदारी पर असर नहीं
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और सामरिक क्षेत्र के सहयोग को अमेरिकी संसद के दोनों प्रमुख दलों का भरपूर समर्थन हासिल है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल और प्रभुत्व को देखते हुए भारत को एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि चुनावी परिणामों से दोनों देशों के रक्षा संबंधों में किसी भी बड़े बदलाव की गुंजाइश बेहद कम है। जानकारों का मानना है कि घरेलू राजनीतिक दबावों के बीच घिरे रहने पर राष्ट्रपति कई बार विदेश मामलों में ज्यादा आक्रामक तेवर भी अपना सकते हैं। ऐसी स्थिति में भारत के लिए यही उचित रहेगा कि वह अमेरिकी चुनाव के नतीजों के आधार पर अपनी नीति तय करने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए संवाद का सिलसिला निरंतर जारी रखे।

