काठमांडू। नेपाल में ऐतिहासिक 'जेन-जी' आंदोलन के दम पर सत्ता के शिखर पर पहुंचे बालेन्द्र शाह (बालेन) के प्रधानमंत्री कार्यकाल के शुरुआती 5 महीने उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। युवा नेतृत्व से देश को भारी उम्मीदें थीं, लेकिन प्रशासनिक अनुभव की कमी, लगातार गैर-मौजूदगी और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों के चलते उनकी सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे समय में देश में आई भीषण प्राकृतिक आपदा उनके नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर सामने आई है।
आंदोलन की लहर से सत्ता तक का सफर
सितंबर 2025 में सोशल मीडिया पर पाबंदी के खिलाफ शुरू हुआ युवाओं का प्रदर्शन जल्द ही भ्रष्टाचार विरोधी जन-आंदोलन में बदल गया था। इसके दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद हुए आम चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने 275 में से 182 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बालेन शाह देश के नए प्रधानमंत्री बने।
अनुभवहीनता और शुरुआती विवाद
सत्ता संभालने के बाद बालेन शाह की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे। संसद और अपनी ही पार्टी की केंद्रीय बैठकों से लगातार अनुपस्थिति, अध्यादेशों के जरिए सरकार चलाने का प्रयास और फैसलों को बार-बार वापस लेने जैसे कदमों से सरकार की किरकिरी हुई। इसके अलावा, भारत को लेकर दिए गए बयानों और भारतीय सामानों पर सीमा शुल्क बढ़ाने जैसे फैसलों ने कूटनीतिक स्तर पर भी असहज स्थिति पैदा की, जिन्हें भारी विरोध के बाद वापस लेना पड़ा। पार्टी के भीतर आरएसपी अध्यक्ष रवि लामिछाने के बढ़ते प्रभाव से सत्ता के दो केंद्र बनने की चर्चाएं भी तेज हुईं।
प्राकृतिक आपदा बनी साख बचाने का मौका
हाल ही में त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों में अचानक आई भीषण बाढ़ से रसुवा और नुवाकोट जिलों में भारी तबाही हुई है। सैकड़ों लोगों की जान जाने और आधारभूत ढांचे को हुए नुकसान के बीच राहत एवं बचाव कार्य सरकार की शीर्ष प्राथमिकता बन गया है। जानकारों का मानना है कि यदि बालेन सरकार इस संकट के समय पुनर्वास, बुनियादी ढांचे की बहाली और केंद्र व स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल बिठाने में सफल रहती है, तो यह उनकी गिरती राजनीतिक साख को दोबारा मजबूत करने का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।

