नई दिल्ली :LS Election 2024 के लिए आज शुक्रवार को पहले चरण की वोटिंग हुई. 21 राज्यों की 102 सीटों पर हुए मतदान में 60 प्रतिशत वोटिंग हुई है. देखा गया है कि इस बार मतदान में पिछले चुनावों 2014 और 2019 के चुनावों के मुकाबले लोगों में कम उत्साह दिखा, कम लोग मतदान केंद्र तक पहुंचे. 2019 में पहले चरण में लगभग 70 फीसदी वोटिंग हुई थी. इस बार देश के किसी भी हिस्से में मतदान का प्रतिशत 80 तक नहीं पहुंच सका है.
पहले चरण की वोटिंग में सबसे ज्यादा वोटिंग उत्तर पूर्व के राज्य त्रिपुरा में हुई. यहां 79.9 फीसदी वोट पड़े. दूसरा राज्य पश्चिम बंगाल है, जहां लगभग 78 प्रतिशत मतदान की खबर है . हैरानी का बात ये रही कि पिछले कुछ दिनों में सियासी रुप से सबसे हलचल वाले राज्य बिहार में सबसे कम मतदान देखने के लिए मिला. यहां केवल 47.50 प्रतिशत वोटिंग की खबर है.
LS Election 2024 आखिर मतदाताओं में उत्साह कम क्यों ?
मतदान का प्रतिशत देखते हुए अब ये सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्या वजह है कि तमाम प्रचार और हो हल्ला शोर शराबे के बावजूद मतदाता मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे ?
उत्तर भारत के राज्यों में कम वोटिंग ?
LS Election 2024 बीजेपी की तरफ से मिशन 400 पार को लेकर ये माना जा रहा था कि हिंदी पट्टी के राज्यों यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान में पार्टी पहले के मुकाबले बेहतर स्थिति में है ,इसलिए उम्मीद ये की जा रही थी कि इन राज्यों में बीजेपी को उम्मीद से अधिक अच्छे परिणाम मिलैंगे लेकिन मतदान प्रतिशत में गिरावट के बाद इन इलाकों पर टिकी बीजेपी को नुकसान का मुंह देखना पड़ सकता है.
मिशन साउथ के चक्कर में क्या नार्थ से शिफ्ट हो गया है फोकस ?
पिछले चुनावों के मुकाबले बीजेपी इस बार दक्षिण के राज्यों में ज्यादा एक्टिव है. पीएम मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी के पहली पंक्ति के नेता लगातार रैलियां , रोड शो और सभाएं कर रहे हैं. दरअसल बीजेपी ने इस बार अपने लिए जो 400 पार का टारगेट रखा है, उसके लिए जरुरी भी है कि दक्षिण के राज्यों से उन्हें सीटें मिले लेकिन सवाल ये है कि किया मिशन साउथ के चक्कर में बीजेपी ने उत्तर के राज्यों में कम ध्यान दिया है, या यहां मतदाताओं को रिझाने में कहीं कोई कमी रह गई है.
बीजेपी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले राज्यों में भी वोटर्स में उत्साह कम
उत्तर प्रदेश आज के समय मे बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ है. यहां पार्टी 80 में 78 सीटें जीतने का दावा कर रही है. यूपी में पहले चरण में जिन क्षेत्रों में चुनाव हुए उसमें करीब 57 प्रतिशत वो पड़े, जबकि पिछले चुनाव में इन्ही सीटों पर 67 प्रतिशत तक मतदान हुए थे. बिहार में आज जिन चार लोकसभा सीटों जमुई , औरंगाबाद, गया और नवादा मे पोलिंग हुई उसमें लगभग 47 प्रतिशत मतदान हुआ जबकि इन्हीं सीटो पर पिछले चुनाव में 53 प्रतिशत वोटिंग हुई थी.
बात अगर मध्य प्रदेश की करें तो यहां पहले चरण की वोटिंग में 63 प्रतिशत वोट पड़े हैं, जबकि पिछले चुनाव में यहां 75 प्रतिशत वोट पड़े थे.ऐसी ही स्थिति राजस्थान में भी देखने के लिए मिली. राजस्थान में पहले चरण में केवल 50 प्रतिशत मतदान की खबर है जबकि 2019 में यहां 64 प्रतिशत वोट पड़े थे.
कम मतदान के क्या है मायने,सत्ता पक्ष के लिए फायदा या नुकसान ?
कम मतदान को लेकर अक्सर एक थ्योरी दी जाती है कि अगर वोटिंग प्रतिशत कम रहता है तो इसका मतलब है कि जनता सत्ता में बदलाव नहीं चाहती है . पिछले चुनावों में ये देखा गया है कि जब जब बंपर वोटिंग हुई है, जनता घरों से निकल कर मतदान केंद्रों तक पहुंची है, सत्ता में परिवर्तन देखने के लिए मिला है.कहा जाता है कि जब जनता सरकार बदलना चाहती है तो अधिक मतदान होते हैं. एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 12 चुनावों के बारे में अगर देखा जाये तो ये देखा गया है कि 7 बार जब जब मतदान प्रतिशत बढ़े हैं, 4 बार सत्ता में परिवर्तन हुआ है. वहीं 5 बार जब जब मतदान प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है तो 4 बार सत्ता बदली है .
ऐसे मे अभी ये अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि जनता का रुख क्या है, क्योंकि 7 चरणों वाले लोकसभा चुनाव का पहला ही चरण है. जाहिर है हमें अगले चऱणों में होने वाले मतदान के रुझान और आखिर में 4 जून के रिजल्ट का इंतजार करना होगा.

