ATF Ethanol Blending : भारत में हवाई सफर करने वालों और एविएशन सेक्टर के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है. केंद्र सरकार ने विमानों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की परिभाषा को बदलते हुए इसमें इथेनॉल और सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन के मिश्रण की अनुमति दे दी है. इस फैसले से संबंधित आधिकारिक राजपत्र अधिसूचना पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जारी कर दिया है.
The Petroleum and Natural Gas Ministry issued a fresh notification to align fuel definitions and regulatory provisions with evolving industry standards. Aviation Turbine Fuel (ATF) can now be blended with synthetic fuels under new rules. The move is aimed at bringing clarity to… pic.twitter.com/xxDZCYP4oT
— ANI (@ANI) April 22, 2026
ATF Ethanol Blending : ईंधन की परिभाषा में हुआ बड़ा विस्तार
सरकार ने नए नियमों के तहत एटीएफ के दायरे को काफी बढ़ा दिया है. अब विमानों के ईंधन में न केवल पारंपरिक तेल होगा, बल्कि इसमें पर्यावरण के अनुकूल इथेनॉल और मानव-निर्मित सिंथेटिक हाइड्रोकार्बन को भी शामिल किया जा सकेगा. यह बदलाव आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत ‘एविएशन टर्बाइन फ्यूल (मार्केटिंग का विनियमन) आदेश 2001’ में संशोधन करके किया गया है.
नियमों में हुआ अहम बदलाव
मंत्रालय ने एटीएफ की मार्केटिंग से जुड़े पुराने नियमों को अपडेट किया है. नए प्रावधानों को संशोधित आपराधिक प्रक्रियाओं के अनुरूप बनाया गया है ताकि नियमों का पालन सख्ती से हो सके. हालांकि, सरकार ने फिलहाल इसके लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की है. अभी किसी भी कंपनी के लिए मिश्रण का कोई अनिवार्य लक्ष्य भी निर्धारित नहीं किया गया है, जिससे कंपनियों को इसे अपनाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा.
इथेनॉल ब्लेंडिंग से क्या होंगे फायदे
अब तक हमारे विमान पूरी तरह से पारंपरिक तेल पर निर्भर थे, जो विदेशों से आयात किया जाता है. ईंधन में सिंथेटिक मिश्रण होने से कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी. इसके अलावा, विमानों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी आएगी. यह कदम भारत को ग्लोबल ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर तेजी से ले जाएगा, जिससे हमारा आसमान पहले से अधिक साफ रहेगा.
क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ते कदम
सरकार का यह फैसला भविष्य की ‘क्लीन एनर्जी’ की रणनीति का हिस्सा है. नए नियमों के अनुसार अब ईंधन को IS 17081 जैसे कड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के साथ मिलाया जा सकेगा. हालांकि अनिवार्य लक्ष्य अभी तय नहीं हैं, लेकिन नियमों में यह लचीलापन भविष्य में विमानन क्षेत्र को और अधिक टिकाऊ और किफायती बनाने की नींव रखेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से लंबी अवधि में हवाई किराए में भी स्थिरता आ सकती है.

