डॉलर की मजबूती और तेल की मार, आखिर कब मिलेगी राहत?

नई दिल्ली |  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार इस प्रयास में हैं कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत 100 रुपये के स्तर तक न गिरे। हालांकि, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया इसे महज एक 'नंबर गेम' का भ्रम बताते हुए केंद्रीय बैंक को बाजार में अत्यधिक हस्तक्षेप न करने और संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, मजबूत होता डॉलर और कमजोर पड़ता रुपया इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। रूस-यूक्रेन विवाद के समय भारत ने अपने हितों को सर्वोपरि रखकर रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदा था, लेकिन बाद में अमेरिकी दबाव और रणनीतिक संतुलन बनाने के लिए इस खरीद में कटौती की गई। इस बीच, पश्चिम एशिया संकट के बाद ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों पर चीन, रूस और ईरान की बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।

वैश्विक गुटबाजी और भारत की तटस्थ नीति के समक्ष चुनौतियां

भारत पारंपरिक रूप से गुटनिरपेक्ष नीति का समर्थक रहा है, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में संतुलन साधना कठिन होता जा रहा है। एक तरफ जहां भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान का 'क्वॉड' (Quad) समूह मजबूत हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ ब्रिक्स देश डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए अपनी साझा मुद्रा पर विचार कर रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन की टैरिफ नीतियों और ब्रिक्स के प्रति कड़े रुख के बीच भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को बचाए रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

 क्षेत्रीय सीमाएं और पड़ोसी देशों के साथ तल्ख रिश्ते

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे के साथ-साथ भारत को अपने क्षेत्रीय मोर्चे पर भी कड़े खेल का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान के साथ लंबे समय से कोई उच्च स्तरीय वार्ता नहीं हुई है, जबकि लद्दाख सीमा पर चीन के साथ गतिरोध बरकरार है। इसके अतिरिक्त, मालदीव और बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक बदलावों के बाद संबंधों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही है। नेपाल में भी नई सरकार के साथ रिश्तों को पटरी पर लाने के प्रयास जारी हैं। इन भू-राजनीतिक तनावों का सीधा असर देश की आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है।

आर्थिक संकट के आंतरिक कारण और भविष्य की राह

भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष इस समय तीन बड़े संकट हैं। पहला, विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसा निकालकर मजबूत होते अमेरिकी बाजार की ओर रुख करना। दूसरा, राज्यों द्वारा वित्तीय अनुशासन को ताक पर रखकर मुफ्त की योजनाएं चलाना, जिसके लिए भारी कर्ज लिया जा रहा है। तीसरा, अपनी ईंधन जरूरतों का 85 प्रतिशत आयात करना और देश में सोने-चांदी के प्रति अत्यधिक आकर्षण, जिसके कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक आपूर्ति शृंखला और होर्मुज जलडमरूमध्य के हालात सामान्य हो भी जाएं, तो भी स्थिति सुधरने में पांच से छह महीने का समय लगेगा। आने वाले समय में रुपये में और गिरावट तथा महंगाई बढ़ने की आशंका है, जिससे निपटने के लिए कड़े आर्थिक फैसलों की आवश्यकता होगी।

Latest news

Related news