भोपाल। प्रदेश के निजी अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की जेब पर मेडिकल कंज्यूमेबल्स (अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली कंज्यूमेबल सामग्री) के नाम पर डाका डाला जा रहा है। सरकार दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर सीमा तय करके उनके दाम तो नियंत्रित कर रही है, लेकिन इलाज के दौरान सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले कंज्यूमेबल्स की कीमतों पर कोई प्रभावी अंकुश नहीं है। कंपनियां इन उत्पादों पर कई गुना अधिक एमआरपी छाप रही हैं, जिसके दम पर निजी अस्पताल मरीजों को 10 से 25 गुना तक अधिक दाम वसूलकर भारी-भरकम मुनाफा कमा रहे हैं।
सरकारी सप्लाई और निजी अस्पतालों की दरों में जमीन-आसमान का अंतर
मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉर्पोरेशन द्वारा सरकारी अस्पतालों के लिए तय की गई दरों और निजी अस्पतालों की कीमतों की तुलना करने पर इस खेल की भयावह तस्वीर सामने आती है। जो फार्मा कंपनियां सरकारी तंत्र को मात्र 4.18 रुपये में आइवी कैन्यूला सप्लाई करती हैं, वही कैन्यूला निजी अस्पतालों में मरीजों को 160 से 180 रुपये तक में बेचा जा रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि कंपनियां सरकारी सप्लाई के न्यूनतम कांट्रैक्ट रेट में भी अपना लाभ शामिल रखती हैं, ऐसे में निजी अस्पतालों में एमआरपी के नाम पर वसूली जा रही ये कीमतें मरीजों के साथ सीधे तौर पर खुली लूट हैं।
भर्ती होते ही शुरू होती है जेब काटने की प्रक्रिया
जैसे ही कोई मरीज अस्पताल में दाखिल होता है, उससे सबसे पहले आइवी सेट, कैन्यूला, डिस्पोजेबल सिरिंज, कैथेटर और सैनिटाइजर जैसे कंज्यूमेबल्स मंगवाए जाते हैं। कंपनियां भारी-भरकम एमआरपी अंकित कर डिस्ट्रीब्यूटर्स को सप्लाई देती हैं, जो अपना 40 से 50 फीसदी मुनाफा जोड़कर अस्पतालों को बेचते हैं। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन मरीजों को एमआरपी या महज 5 से 10 प्रतिशत की मामूली छूट का झांसा देकर ये सामान बेचता है। इसके अलावा, दवाओं की तर्ज पर कंज्यूमेबल्स में भी ब्रांड बदलते ही दरों में 50 से 100 फीसदी तक का अंतर आ जाता है।
नियंत्रण और सख्त जांच की उठ रही मांग
स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों और जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को कंज्यूमेबल्स की एमआरपी में कटौती करने के साथ ट्रेड मार्जिन की पारदर्शी सीमा तय करनी चाहिए और इन दरों की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए। वहीं, खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) मध्य प्रदेश के नियंत्रक मनोज पुष्प के अनुसार, दवाओं और कंज्यूमेबल्स के रेट तय करना सीधे तौर पर राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, इसलिए इस संबंध में मिलने वाली सभी शिकायतों और सुझावों को एनपीपीए को भेजा जाता है।

