‘बैरिकेड्स का एक मकसद होता है’,‘आप GenZ नहीं हैं’- दिल्ली HC ने सौरव दास और आशुतोष रांका को लगाई फटकार

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को जेल में बंद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर में घुसने की कथित कोशिश के लिए फटकार लगाई. कोर्ट ने कहा कि “बैरिकेड्स का एक मकसद होता है”. कोर्ट की ये टिप्पणी जंतर मंतर के बतौर विरोध प्रदर्शन की तय जगह के तौर पर डी-नोटिफाई कर दिया को लेकर आई.
दोनों नेताओं ने अपनी ज्यूडिशियल कस्टडी बढ़ाने को चुनौती देने वाली अपनी अर्जी वापस ले ली, क्योंकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पर सुनवाई करने से मना कर दिया था.

7 दिन से न्यायिक हिरासत में हैं दास और रांका

CJP के दास और रांका 14 अक्टूबर से न्यायिक हिरासत में हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने जंतर-मंतर के बंद गेट पर चढ़कर हंगामा किया था. जंतर-मंतर से उन्होंने जून-जुलाई में संगठन के फाउंडर अभिजीत दिपके के साथ मिलकर एक प्रोटेस्ट किया था, जिसके चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था. इस महीने की शुरुआत में जंतर-मंतर को तय प्रोटेस्ट साइट से हटा दिया गया था.
सौरव दास और आशुतोष रांका ने मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट में एक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें कथित पीस बॉन्ड उल्लंघन से जुड़े एक मामले में उनकी ज्यूडिशियल कस्टडी बढ़ाई गई थी.

CJP के दास और रांका ने कस्टडी बढ़ाने को दी थी चुनौती

यह चुनौती 19 अक्टूबर को दिल्ली के मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) के उस आदेश के बाद आई है, जिसमें उनकी कस्टडी दो दिन बढ़ाई गई थी. मजिस्ट्रेट ने पब्लिक शांति और सुरक्षा को लेकर चिंताओं का हवाला दिया था, और कहा था कि CJP नेताओं ने डी-नोटिफाइड जगहों पर बार-बार विरोध प्रदर्शन का आह्वान करके “कानून का कोई सम्मान नहीं” दिखाया, जिससे दिल्ली पुलिस की इस बात का समर्थन हुआ कि उनकी रिहाई से पब्लिक ऑर्डर को खतरा हो सकता है.
कोर्ट ने कहा, “जब आपके बेल बॉन्ड स्वीकार किए जाते हैं, तो श्योरिटी दी जाती है. जब बेल बॉन्ड तोड़ा जाता है तो BNSS में एक प्रोसीजर होता है. उस प्रोसीजर को फॉलो करने के बजाय, जिसमें आपकी श्योरिटी वगैरह जब्त हो सकती है, शायद वे आपको नया नोटिस देकर आपके लिए ज़्यादा मेहरबान होंगे.”

‘बैरिकेड्स किसी मकसद से लगाए गए हैं’: HC ने भारत के बाहर ‘आगजनी’ का ज़िक्र किया

हाईकोर्ट ने पिटीशनर्स के बर्ताव पर भी सवाल उठाए, यह बताते हुए कि वे प्रोटेस्ट में सबसे आगे थे और कथित तौर पर परमिशन न होने के बावजूद उन्होंने बैरिकेड्स तोड़े थे.
कोर्ट ने दोनों के वकील अभिक चिमनी से कहा, “बैरिकेड्स किसी मकसद से लगाए गए हैं… और जब आप बैरिकेड तोड़ते हैं, तो 10-20 लोगों के आने का चांस होता है,” उन्होंने दूसरे देशों में “आगजनी” और अशांति की घटनाओं का ज़िक्र किया.
“हम देख रहे हैं कि हमारे देश के बाहर क्या हो रहा है… आगजनी वगैरह. हो सकता है आपने किसी ऐसी चीज़ से शुरुआत की हो जिसे आप शांतिपूर्ण कहते हैं. उस मकसद के लिए आप पुलिस की परमिशन लेते हैं ताकि अनचाहे लोग आपके ग्रुप में शामिल न हों और आपका नाम खराब न करें,” बार एंड बेंच ने हाई कोर्ट के हवाले से कहा.
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी फ्रांस में हो रहे हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद आई है.
विरोध के हालात पर सवाल उठाते हुए, कोर्ट ने चिमनी से पूछा: “आप वहां गए थे, एक बैरिकेड तोड़ा… बिना परमिशन के… हम सब देखेंगे… यहां क्या हो रहा है? क्या यह (SEM का ऑर्डर) रिवाइज़ करने लायक ऑर्डर है?”

आप GenZ नहीं हैं- कोर्ट

सुनवाई के बीच कोर्ट ने पूछा कि दास और रांका की उम्र कितनी है, जिस पर चिमनी ने जवाब दिया कि वे क्रमशः 27 और 32 साल के हैं.
बार एंड बेंच के अनुसार, चिमनी ने कहा, “सौरव 27 साल का है और आशुतोष 32 साल का है.”
कोर्ट ने कथित तौर पर जवाब दिया, “तो आप GenZ नहीं हैं. GenZ क्या है? कोर्ट को बताया गया है कि 1997 के बाद पैदा हुए लोग GenZ हैं. तो आप GenZ नहीं हैं.”

दास और रांका से बेल बॉन्ड तोड़ने पर सवाल

हाई कोर्ट ने अभिक चिमनी से उनके बेल बॉन्ड भरने और कथित तौर पर जंतर-मंतर ट्रेसपास एक्ट के तहत तोड़ने के बाद अपनाए गए प्रोसेस के बारे में पूछा. कोर्ट ने देखा कि पिटीशनर्स ने 11 अक्टूबर को बेल बॉन्ड भरे थे, उसी दिन जंतर-मंतर को एक तय प्रोटेस्ट साइट के तौर पर डी-नोटिफाई किया गया था, फिर उन्हें फिर से अरेस्ट किया गया. इसने सवाल किया कि बेल बॉन्ड तोड़ने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत बताए गए प्रोसेस का पालन क्यों नहीं किया गया.
10 अक्टूबर को दास और रांका को इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 पर हिरासत में लिया गया. BNSS के सेक्शन 126 और 170 के तहत प्रिवेंटिव एक्शन शुरू किया गया, और उन्होंने शुरू में ₹50,000-₹50,000 के बेल बॉन्ड भरे.
11 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को तय प्रोटेस्ट साइट के तौर पर डी-नोटिफाई कर दिया. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में अलग-अलग चुनौती दी गई है.

रांका के वकील ने क्या पूछा

दोनों के वकील ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली पुलिस ने इस बारे में कोई एक्सप्लेनेशन नहीं दिया है कि ऐसा कौन सा मटीरियल मिला है जिससे पता चले कि भविष्य में कोई “आने वाला खतरा” है, जैसा कि 19 अक्टूबर को दास और रांका की ज्यूडिशियल कस्टडी बढ़ाने वाले केस में बताया गया था.

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