नई दिल्ली। आज के दौर में युद्ध केवल जमीन, समुद्र या आसमान तक सीमित नहीं अब भविष्य की किसी बड़ी जंग की शुरुआत बिना मिसाइल दागे अंतरिक्ष में भी हो सकती है। अमेरिका और चीन तेजी से ऐसी अंतरिक्ष तकनीकों और उपग्रह प्रणालियों पर काम कर रहे हैं, जो दुश्मन के सैटेलाइट नेटवर्क को निशाना बनाने में सक्षम हो सकती हैं। यही वजह है कि पृथ्वी से हजारों किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष अब एक नए सैन्य मुकाबले का मैदान बनता जा रहा है। आधुनिक सैन्य व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भर है। जीपीएस, सैन्य संचार, मिसाइल नेविगेशन, दुश्मन की निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने जैसे कई महत्वपूर्ण काम अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों के जरिए होते हैं। ऐसे में यदि किसी देश के सैटेलाइट नेटवर्क को जाम कर दिया जाए, उसकी संचार व्यवस्था बाधित कर दी जाए या उसे गलत जानकारी मिलने लगे, तो उसकी सैन्य क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है। सितंबर 2025 में अमेरिका और ब्रिटेन की अंतरिक्ष सेनाओं ने संयुक्त अभियान के दौरान चीन के शियान 12-01 उपग्रह के करीब पहुंचकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन किया था। इस घटना को अंतरिक्ष में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संकेत के रूप में देखा गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और संचार का क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि बड़ी शक्तियों की सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन चुका है। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों को आशंका है कि चीन ऐसी तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है, जिनके जरिए युद्ध की स्थिति में दुश्मन के सैटेलाइट नेटवर्क को कमजोर किया जा सकता है। सबसे गंभीर स्थिति तब बन सकती है, जब कोई उपग्रह चुपचाप दूसरे देश के महत्वपूर्ण सैन्य सैटेलाइट के बेहद करीब पहुंच जाए।
विशेषज्ञ इस तरह की संभावित लड़ाई को ‘ऑर्बिटल वॉरफेयर’ यानी कक्षीय युद्ध कहते हैं। इसमें एक अंतरिक्ष यान या उपग्रह का इस्तेमाल दूसरे उपग्रह की निगरानी, पीछा करने, उसके रास्ते में बाधा डालने या उसकी गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। भविष्य में केवल सैटेलाइटों की संख्या ही अहम नहीं होगी, बल्कि उनकी गति, दिशा बदलने की क्षमता और तकनीकी फुर्ती भी निर्णायक हो सकती है। पुराने दौर के उपग्रह आमतौर पर एक निश्चित कक्षा में रहकर अपना काम करते थे, लेकिन नई पीढ़ी के सैन्य उपग्रह अधिक सक्रिय और गतिशील हो सकते हैं। वे अपनी दिशा बदल सकते हैं, किसी दूसरे उपग्रह के करीब पहुंच सकते हैं और आसपास की परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो सकते हैं। एआई आधारित प्रणालियों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ इनकी भूमिका और भी अहम हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी संभावित ताइवान संघर्ष की स्थिति में अंतरिक्ष सबसे अहम मोर्चों में से एक बन सकता है। अमेरिका और चीन दोनों ही अपने उपग्रह नेटवर्क के जरिए एक-दूसरे की नौसेना, सैन्य ठिकानों, मिसाइल प्रणालियों और सैनिक गतिविधियों पर नजर रखने की कोशिश करेंगे। ऐसी स्थिति में जमीन पर पहली गोली चलने से पहले ही अंतरिक्ष में तकनीकी संघर्ष शुरू हो सकता है। भविष्य की जंग में जीत केवल उस देश की नहीं होगी जिसके पास सबसे ज्यादा उपग्रह होंगे, बल्कि उसकी होगी जो अपने अंतरिक्ष नेटवर्क को तेजी से सुरक्षित रख सके, नुकसान के बाद दोबारा तैयार कर सके और दुश्मन की संचार एवं निगरानी प्रणाली को प्रभावी ढंग से चुनौती दे सके। आने वाले समय में अंतरिक्ष की लड़ाई हथियारों से ज्यादा गति, सूचना, तकनीक और रणनीति की लड़ाई साबित हो सकती है।

