बांकीपुर में होगी बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक जंग,प्रशांत किशोर खुद लडेंगे चुनाव

Prashant Kishore  : बिहार  में आने वाले जुलाई-अगस्त के महीने में होने वाले विधानसबा उफचुनाव के लिए सियासी पारा हाई  हो गया है. खास कर प्रशांत किशोर के ऐलान के बाद ये अनुमान लगाया जा रहा है कि इस सीट पर मुकाबला तड़गा होने जा रहा है. दरअसल  जन सुराज (Jan Suraaj) पार्टी के संस्थापक और प्रख्यात चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने पटना की चर्चित बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर बड़ा दांव खेल दिया है.  प्रशांत किशोर ने ऐलान किया है कि अगर उनकी पार्टी की सहमति होती है, तो वे खुद बांकीपुर सीट से चुनावी मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

मीडिया चैनल ‘आजतक’ से एक बातचीत के दौरान प्रशांत किशोर ने कहा कि अगर पार्टी चाहेगी तो वो बांकीपुर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं. पीके के इस ऐलान के बाद से ही बिहार का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है.

Prashant Kishore:सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर पहला ‘जनमत संग्रह’

प्रशांत किशोर का कहना है कि  बांकीपुर का उपचुनाव  महज एक विधानसभा सीट का मुकाबला नहीं है बल्कि ये सम्राट चौधरी के नेतृत्व में पहला जनमत संग्रह होगा. उन्होंने इस उपचुनाव को सीधे तौर पर सूबे के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल और उनके कामकाज की पहली बड़ी परीक्षा करार दिया है.

पीके (Prashant Kishor) ने बड़ा दावा करते हुए कहा:

“यह चुनाव सिर्फ एक विधानसभा सीट का नहीं है, बल्कि यह मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर जनता के फैसले का चुनाव होगा। बांकीपुर की जनता सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने से बेहद नाराज है।”

प्रशांत किशोर का तर्क है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में बांकीपुर के मतदाताओं ने सम्राट चौधरी के चेहरे पर नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के नाम पर एनडीए (NDA) को वोट दिया था. उन्होंने बीजेपी को खुली चुनौती देते हुए कहा, “अगर मेरे चुनाव लड़ने से भाजपा बांकीपुर जैसी अपनी सबसे मजबूत सीट हारती है, तो मैं इस मैदान में उतरने के लिए तैयार हूं.”

2025 के फैसले के बाद पीके की रणनीति में बड़ा बदलाव

राजनीतिक गलियारों में प्रशांत किशोर के इस ऐलान को एक बहुत बड़े ‘यू-टर्न’ और बदली हुई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. गौरतलब है कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव न लड़ने की कसम खाई थी.

पहले चुनाव क्यों नहीं लड़े थे प्रशांत किशोर?

  • पूरे बिहार में प्रचार का दबाव: उस समय पीके का कहना था कि अगर वे खुद किसी एक सीट पर बंध जाएंगे, तो पूरे बिहार में जन सुराज के बाकी उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं कर पाएंगे. इसी वजह से उन्होंने खुद को चुनावी मैदान से दूर रखा था.

  • गृह क्षेत्र की चर्चा: इससे पहले चर्चा थी कि अगर वे कभी चुनाव लड़ेंगे तो अपने गृह क्षेत्र ‘करगहर’ से किस्मत आजमाएंगे.

  • राघोपुर से लड़ने की अटकलें: सियासी गलियारों में तेजस्वी यादव के खिलाफ राघोपुर सीट से भी उनके उतरने की चर्चाएं तेज हुई थीं, लेकिन उन्होंने वहां से भी कदम पीछे खींच लिए थे.

अब चूंकि राज्य में केवल एक ही सीट (बांकीपुर) पर उपचुनाव होना है, ऐसे में प्रशांत किशोर खुद मैदान में उतरकर न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता को परखना चाहते हैं, बल्कि जन सुराज के लिए एक मजबूत ‘पॉलिटिकल ऑक्सीजन’ भी तलाश रहे हैं.

बांकीपुर सीट: क्यों है यह भाजपा का अजेय किला?

बांकीपुर विधानसभा सीट को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ माना जाता है. पिछले लगभग 40 सालों से इस सीट पर भाजपा का एकछत्र राज रहा है और विरोधी दल तमाम कोशिशों के बाद भी यहां सेंध लगाने में नाकाम रहे हैं. यह सीट बीजेपी के कद्दावर नेताओं का केंद्र रही है. इस सीट से भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन नबीन 5 बार विधायक रह चुके हैं . नीतिन नबीन से पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद यहां से 4 बार विधायक रह चुके हैं.  ऐसे में बीते लगभग 45 वर्षों से इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा रहा है.ऐसे में प्रशांत किशोर के द्वारा बीजेपी के इस मजबूत किले को चुनना उनके राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा जुआ (Gamble) माना जा रहा है.

मुकाबला हुआ त्रिकोणीय, दांव पर सबकी प्रतिष्ठा

अगर प्रशांत किशोर आधिकारिक तौर पर बांकीपुर से पर्चा दाखिल करते हैं, तो यह लड़ाई बेहद दिलचस्प और बहुकोणीय हो जाएगी:

  1. सम्राट चौधरी की साख: मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके नेतृत्व की यह पहली और सबसे बड़ी चुनावी परीक्षा होगी।

  2. प्रशांत किशोर का वजूद: चुनावी रणनीतिकार से जमीन पर नेता बनने की कोशिश में जुटे पीके की व्यक्तिगत स्वीकार्यता की यह सबसे बड़ी कसौटी होगी.

  3. जन सुराज का भविष्य: 2025 के मुख्य चुनावों के बाद इस उपचुनाव के नतीजे तय करेंगे कि बिहार की जनता जन सुराज को मुख्यधारा के विकल्प के रूप में कितना पसंद कर रही है.

अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि बीजेपी इस गढ़ को बचाने के लिए क्या रणनीति अपनाती है और प्रशांत किशोर का यह बड़ा दांव बिहार की राजनीति की दशा और दिशा को कितना बदल पाता है.

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