PM Modi’s Temple Politics:कोलकाता: पश्चिम बंगाल के चुनावी महासमर का आखिरी पड़ाव आ चुका है. अंतिम चरण की 142 सीटों पर 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए सोमवार को प्रचार थम जाएगा. इस चुनावी मैच के ‘स्लॉग ओवर’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी ताकत झोंक दी है. रविवार को पीएम मोदी ने कोलकाता के प्रसिद्ध काली मंदिर और उत्तर 24 परगना के मतुआ ठाकुर मंदिर में पूजा-अर्चना कर एक बड़ा सियासी संदेश देने की कोशिश की है.
PM Modi’s Temple Politics:आखिरी ओवर में ‘रन’ बनाने वाला दांव
क्रिकेट की पिच की तरह ही बंगाल के चुनावी मैदान में भी आखिरी पलों यानी ‘स्लॉग ओवर’ का रोमांच चरम पर है. जहां टीएमसी अपने गढ़ को बचाने के लिए फील्डिंग मजबूत कर रही है, वहीं पीएम मोदी ने रविवार को ‘टेंपल पॉलिटिक्स’ की बैटिंग से सियासी माहौल बदलने की रणनीति अपनाई है. 142 सीटों का यह इलाका ममता बनर्जी का सबसे मजबूत किला माना जाता है, जहां बीजेपी सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश कर रही है.
कालीबाड़ी में ‘सिद्धेश्वरी’ के दर्शन और खान-पान का संदेश
पीएम मोदी ने कोलकाता के ऐतिहासिक थंथनिया कालीबाड़ी मंदिर में माथा टेका. यहाँ ‘मां सिद्धेश्वरी’ की पूजा करना केवल आस्था नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक कदम भी माना जा रहा है. दरअसल, यह वही मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में ‘मांस’ चढ़ाया जाता है.
पीएम मोदी का यहाँ जाना टीएमसी के उस नैरेटिव को काटने की कोशिश है, जिसमें बीजेपी को शाकाहारी थोपने वाली पार्टी बताया गया था. खुद शाकाहारी होने के बावजूद मोदी का इस मंदिर में जाना यह संदेश देता है कि बीजेपी बंगाल की परंपराओं और मांसाहारी खान-पान के खिलाफ नहीं है.
ममता के ‘बाहरी’ वाले नैरेटिव पर प्रहार
ममता बनर्जी लगातार यह आरोप लगाती रही हैं कि बीजेपी सत्ता में आई तो बंगाल की खान-पान की आदतों (माछ-भात) पर रोक लगा देगी और उत्तर भारतीय प्रथाएं थोपेगी. बीजेपी को ‘बाहरियों’ की पार्टी साबित करना ममता का मुख्य हथियार रहा है. पीएम मोदी ने काली मंदिर जाकर और बीजेपी नेताओं द्वारा चुनाव प्रचार में मछली-चावल खाकर इस ‘बाहरी’ वाली छवि को तोड़ने का प्रयास किया है.
मतुआ समुदाय और सीएए का संकल्प
उत्तर 24 परगना में पीएम मोदी ने मतुआ ठाकुर मंदिर में मत्था टेका. यहाँ उन्होंने मतुआ समुदाय को साधते हुए नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के जरिए तेजी से नागरिकता देने के अपने संकल्प को दोहराया. मतुआ समुदाय का बंगाल की लगभग 32 सीटों पर सीधा प्रभाव है. 2019 के लोकसभा चुनाव में इस समुदाय ने बीजेपी का जमकर साथ दिया था, लेकिन हाल के दिनों में टीएमसी ने यहाँ अपनी पकड़ दोबारा मजबूत करने की कोशिश की है.
सीएए बनाम टीएमसी का ‘दस्तावेज जाल’
ममता बनर्जी ने मतुआ समुदाय के बीच यह डर पैदा करने की कोशिश की है कि सीएए उन्हें नागरिकता देने के बजाय पुराने दस्तावेजों के जाल में फंसा देगा. टीएमसी का तर्क है कि मतुआ समुदाय पहले से ही भारत में सभी अधिकारों का लाभ उठा रहा है, तो उन्हें नए पंजीकरण की क्या जरूरत? इसी भ्रम को दूर करने के लिए पीएम मोदी ने खुद मतुआ धाम पहुंचकर समुदाय के साथ अपने पुराने रिश्तों की दुहाई दी.
क्या ढहेगा ममता का मजबूत दुर्ग?
2021 के आंकड़ों पर नजर डालें तो इन 142 सीटों में से बीजेपी ने सिर्फ 18 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी ने 123 सीटों पर कब्जा जमाकर हैट्रिक लगाई थी. कोलकाता और 24 परगना के इलाकों में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था. इस बार बीजेपी और खास कर पीएम मोदी अपनी चिर परिचित मौके पर चौका मारने वाली राजनीति यानी ‘मंदिर पॉलिटिक्स’ और संस्कृति से जुड़ाव दिखाकर बंगाल के लोगों को ये भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि वो बाहरी नहीं हैं. यहां तक कि ये भी भरोसा दिलाया है कि अगर पार्टी जीती तो कोई बंगाली ही प्रदेश का सीएम भी होगा. अब ये देखना दिलचस्प होगा कि 29 अप्रैल को यहां मतदान करने वाली जनता इन चुनावी टैक्टिक्स पर कितना भरोसा करती है.

