Vikram-1 Launch श्रीहरिकोटा : भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए शनिवार का दिन ऐतिहासिक बन गया. निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अपने पहले ऑर्बिटल मिशन ‘आगमन’ (Aagman Mission) के तहत विक्रम-1 (Vikram-1) रॉकेट का सफल प्रक्षेपण कर नया इतिहास रच दिया. यह उपलब्धि भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है.
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The era of commercial spaceflight has begun in India 🇮🇳#Skyroot | #Vikram1 pic.twitter.com/yba2WRW1Ck
— ISRO Spaceflight (@ISROSpaceflight) July 18, 2026
सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से सुबह करीब 11:30 बजे लॉन्च किए गए विक्रम-1 ने अपने सभी चरण निर्धारित योजना के अनुसार पूरे किए और मिशन में शामिल छोटे उपग्रहों को सफलतापूर्वक उनकी निर्धारित लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में स्थापित किया.पूरे मिशन की निगरानी इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों ने की.इस बड़ी सफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस को बधाई दी.

Vikram-1 Launch:भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि
विक्रम-1 की सफलता केवल स्काईरूट एयरोस्पेस की उपलब्धि नहीं है,बल्कि यह भारत के तेजी से विकसित हो रहे निजी अंतरिक्ष उद्योग की बड़ी जीत भी है.वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलने के बाद पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी ने ऑर्बिटल रॉकेट मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. इस सफलता से भारत वैश्विक स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकेगा.
450 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित होंगे सैटेलाइट
‘आगमन’ मिशन के तहत विक्रम-1 कई ग्राहकों के छोटे उपग्रहों को पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है. यह स्काईरूट के तीन विकासात्मक (Development) मिशनों में पहला है. इसके बाद कंपनी नियमित व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं शुरू करने की तैयारी करेगी.
ऑर्बिटल रॉकेट क्यों है खास?
सब-ऑर्बिटल और ऑर्बिटल रॉकेट में बड़ा अंतर होता है. सब-ऑर्बिटल रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा तक जाकर वापस लौट आता है, जबकि ऑर्बिटल रॉकेट उपग्रह को इतनी गति प्रदान करता है कि वह पृथ्वी की कक्षा में लगातार चक्कर लगाता रहता है. इसी वजह से ऑर्बिटल मिशन तकनीकी रूप से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण माना जाता है.
कैसा है विक्रम-1 रॉकेट?
विक्रम-1 एक चार चरणों (Four-Stage) वाला लॉन्च व्हीकल है।
- पहले तीन चरणों में सॉलिड फ्यूल (ठोस ईंधन) का उपयोग किया गया है।
- चौथे चरण में लिक्विड फ्यूल इंजन लगाया गया है।
- अंतिम चरण का इंजन दोबारा भी चालू किया जा सकता है, जिससे उपग्रहों को उनकी सटीक कक्षा में स्थापित करने में मदद मिलती है।
- यह रॉकेट विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार के उपग्रहों के व्यावसायिक प्रक्षेपण के लिए विकसित किया गया है।
विक्रम-S के बाद अब विक्रम-1 की सफलता
स्काईरूट एयरोस्पेस ने वर्ष 2022 में विक्रम-S नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था, जिसने कंपनी की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया था। हालांकि उस मिशन में कोई उपग्रह कक्षा में स्थापित नहीं किया गया था। विक्रम-1 ने अब कंपनी को ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता वाले निजी भारतीय संस्थानों की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया है।
2018 में हुई थी स्काईरूट की शुरुआत
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी। 2020 में स्पेस सेक्टर के उदारीकरण के बाद कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल विकसित करने की दिशा में तेजी से काम किया। विक्रम-1 की सफलता उसी प्रयास का सबसे बड़ा परिणाम है।
भारत के स्पेस इकोसिस्टम को मिलेगा नया बल
विशेषज्ञों का मानना है कि विक्रम-1 की सफलता से भारत के निजी स्पेस उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी. इससे विदेशी ग्राहकों को आकर्षित करने, निवेश बढ़ाने और देश में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी आधारित स्टार्टअप्स को नई गति मिलने की संभावना है. यह मिशन भारत को वैश्विक कमर्शियल स्पेस लॉन्च बाजार में एक मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.

