SC on Airfare Hike नई दिल्ली: त्योहारों का सीजन आते ही हवाई टिकटों के दाम आसमान छूने लगे हैं। कई रूट पर सामान्य किराये की तुलना में कई गुना अधिक कीमत वसूले जाने के आरोपों के बीच सोमवार, 2 नवंबर को यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. हवाई किराये में 700 फीसदी तक बढ़ोतरी का आरोप लगाते हुए एक वकील ने मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की, लेकिन अदालत में इस मुद्दे पर हुई बातचीत के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ की एक टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई.
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मामले का उल्लेख करते हुए वकील ने कहा कि देश में हवाई किराये में 700 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है. इस पर अदालत से यात्रियों को राहत देने के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की गई.
वकील ने दलील दी कि हवाई यात्रा अब एक आवश्यक सेवा बन चुकी है और किराये में इस तरह की भारी बढ़ोतरी संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.
इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हवाई यात्रा मत कीजिए.”
वकील ने जब अपनी दलील आगे बढ़ाई तो न्यायमूर्ति ने फिर कहा कि हवाई यात्रा मत कीजिए और इसके बाद अगला मामला सुनने के लिए कहा गया.
700 फीसदी किराया बढ़ने का आरोप, तत्काल सुनवाई से इनकार
यह मामला सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष उठाया गया था, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह शामिल थे.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने हवाई किराये में कथित भारी बढ़ोतरी को यात्रियों के लिए परेशानी का विषय बताते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की थी. हालांकि, अदालत ने इस मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया.
यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत ने इस दौरान याचिका पर कोई विस्तृत अंतिम फैसला नहीं सुनाया, बल्कि तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की.
जब हवाई यात्रा जरूरी है तो आम आदमी क्या करे?
सुप्रीम कोर्ट में हुई इस बातचीत ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. त्योहारों के दौरान लाखों लोग अपने घर जाने के लिए हवाई यात्रा करते हैं. नौकरी, कारोबार, पढ़ाई और पारिवारिक जरूरतों के अलावा बीमारी या आपातकालीन परिस्थितियों में भी लोगों को अचानक विमान से यात्रा करनी पड़ती है.
ऐसे में यदि टिकटों की कीमत सामान्य से कई गुना बढ़ जाती है तो आम यात्रियों के सामने परेशानी खड़ी हो जाती है.
मसलन, किसी व्यक्ति को परिवार में बीमारी या किसी जरूरी काम के चलते तत्काल दूसरे शहर जाना हो, तो उसके पास टिकट की ऊंची कीमत चुकाने के अलावा सीमित विकल्प बचते हैं. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यात्रियों को राहत देने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
हवाई किराये पर नियंत्रण की मांग पहले से सुप्रीम कोर्ट में
गौरतलब है कि हवाई किराये में अप्रत्याशित बढ़ोतरी और यात्रियों के हितों की सुरक्षा से जुड़ा एक अन्य मामला भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.
सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायणन ने अपनी याचिका में विमानन क्षेत्र के लिए स्वतंत्र और प्रभावी नियामक व्यवस्था बनाने की मांग की है. याचिका में एयरलाइंस की ओर से किराये और अन्य शुल्कों में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने तथा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता लाने की मांग की गई है.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से नए विमानन नियमों की जानकारी देने को कहा था. इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को निर्धारित है.
सवाल बड़ा है, जवाब कौन देगा?
सुप्रीम कोर्ट में हुई यह संक्षिप्त बातचीत भले ही तत्काल सुनवाई की मांग तक सीमित रही हो, लेकिन इसने आम यात्रियों की परेशानी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल को फिर सामने ला दिया है.
हवाई यात्रा महंगी है तो क्या आम आदमी यात्रा करना छोड़ दे? अगर किसी को त्योहार पर घर जाना है, परिवार में किसी की तबीयत खराब है या कोई जरूरी काम है, तो वह क्या करे?
आज जरूरत इस बात की है कि हवाई किराये तय करने की व्यवस्था में पारदर्शिता हो और असाधारण परिस्थितियों में यात्रियों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए.
क्योंकि आम आदमी की परेशानी केवल हवाई किराये तक सीमित नहीं है. यदि हर जरूरी सेवा से जुड़ी समस्या पर समाधान के बजाय लोगों को उस सेवा का इस्तेमाल न करने की सलाह मिलने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आम नागरिक अपनी समस्या लेकर जाए तो कहां जाए?
एक आम नागरिक के नजरिये से देखें तो सवाल सिर्फ हवाई यात्रा का नहीं, बल्कि जवाबदेही और राहत का भी है.

