नई दिल्ली। संपूर्ण देश में लोकसभा और समस्त राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित करने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को लेकर प्रशासनिक व राजनीतिक हलकों में हलचल तीव्र हो गई है। इस महत्वाकांक्षी पहल पर गठित उच्चस्तरीय समिति के प्रमुख पीपी चौधरी ने स्पष्ट किया कि इस बहुप्रतीक्षित विधेयक का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर के चुनावों को एक ही समय सीमा में संपन्न कराना है। उन्होंने जानकारी प्रदान की कि संसद के निचले सदन द्वारा इस विधेयक को 41 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के सुपुर्द कर दिया गया है। वर्तमान में यह समिति प्रस्ताव के विविध घटकों, संवैधानिक प्रावधानों एवं व्यावहारिक संभावनाओं का गहन अध्ययन कर रही है ताकि एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक धरातल पर उतारा जा सके।
संसदीय समिति के अध्यक्ष का दृष्टिकोण और ऐतिहासिक संदर्भ
समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने संवाददाताओं से चर्चा करते हुए बताया कि निकाय द्वारा इस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु आवश्यक राजनीतिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं पर सूक्ष्मता से विचार-विमर्श किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सभी संबंधित पक्षों एवं विशेषज्ञों से निरंतर बहुमूल्य सुझाव आमंत्रित किए जा रहे हैं। जब उनसे यह प्रश्न किया गया कि वर्ष 1951 से 1967 के मध्य प्रचलित एक साथ चुनाव कराने की परंपरा किस कारण समाप्त हुई, तो उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टान्त देते हुए बताया कि उस दौर में देश के प्रथम चार आम चुनाव लोकसभा और विधानसभाओं के लिए एक साथ ही आयोजित हुए थे। उस समय चुनावों के कालचक्र में एकरूपता बनाए रखने हेतु लगभग आठ से नौ राज्य विधानसभाओं को उनके निर्धारित कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व ही भंग कर दिया गया था ताकि उन्हें राष्ट्रीय चुनावों के साथ समाहित किया जा सके। इससे यह सिद्ध होता है कि हमारे संविधान निर्माताओं की मूल भावना भी एक राष्ट्र, एक चुनाव के सिद्धांत का समर्थन करती थी।
उच्चस्तरीय समिति की कार्यप्रणाली और बैठकों का विवरण
समिति के अब तक के प्रगति प्रतिवेदन की जानकारी साझा करते हुए पीपी चौधरी ने अवगत कराया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' पर गठित यह उच्चस्तरीय समिति राष्ट्रीय राजधानी में अब तक 25 महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित कर चुकी है। इसके साथ ही समिति के प्रतिनिधियों ने लगभग 10 राज्यों का विस्तृत दौरा करके जमीनी स्तर पर विभिन्न हितधारकों से संवाद स्थापित किया है। इन राज्य स्तरीय दौरों के दौरान व्यापारिक संगठनों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों, मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों, राज्य के मुख्य सचिवों, विभागाध्यक्षों, मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यमंत्रियों तथा विधानसभा अध्यक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया गया। इन सभी जनप्रतिनिधियों एवं वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दिए गए व्यावहारिक अनुभवों एवं सुझावों से समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट का खाका तैयार करने में अभूतपूर्व सहयोग प्राप्त हुआ है।
क्षेत्रीय दलों की आशंकाएं और चुनावी इतिहास का विश्लेषण
अध्यक्ष ने इस बात का भी उल्लेख किया कि एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव को लेकर अक्सर यह आशंका व्यक्त की जाती है कि इससे क्षेत्रीय दलों के जनाधार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है अथवा देश के संघात्मक ढांचे को क्षति पहुँच सकती है। इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि विभिन्न विशेषज्ञों ने 1967 से लेकर 2024 तक के समूचे भारतीय चुनावी इतिहास का विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इसमें गठबंधन सरकारों के दौर से लेकर हालिया आम चुनावों के रुझानों का बारीकी से अध्ययन किया गया। विशेषज्ञों के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि जब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग-अलग समय पर कराए जाते हैं, तो केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी कई बार राज्यों में भी भारी सफलता हासिल कर लेती है, जिससे क्षेत्रीय दलों के लिए चुनौती बढ़ जाती है। समिति का अंतिम उद्देश्य एक ऐसी सुदृढ़ चुनावी व्यवस्था का निर्माण करना है जो भारतीय लोकतंत्र को और अधिक मजबूती प्रदान कर सके।

