बिहार में युवाओं के गुस्से से असमंजस में NDA, सहयोगियों के सामने चुनौती

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हो रहे उग्र विरोध प्रदर्शनों और युवाओं की नाराजगी के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के घटक दलों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। इस सियासी घमासान के बीच एनडीए के सहयोगी दल एक अजीब पशोपेश में फंसे हुए हैं, क्योंकि वे न तो खुलकर युवाओं के इस विरोध को खारिज कर सकते हैं और न ही पूरी तरह से इसका समर्थन करने की स्थिति में हैं।

Gen Z वोटों की राजनीति और सहयोगियों की असमंजस की स्थिति

इस आंदोलन में मुख्य रूप से Gen Z यानी युवा वर्ग सड़कों पर उतरा हुआ है, जिसे रिझाने के लिए तमाम विपक्षी और सत्तापक्ष के दल अपनी-अपनी रणनीति बना रहे हैं। यदि एनडीए के प्रमुख सहयोगी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मुखर होते हैं या उन्हें देश-विरोधी करार देने वाली मानसिकता का समर्थन करते हैं, तो वे सीधे तौर पर युवा विरोधी श्रेणी में खड़े हो जाएंगे, जिसका सीधा नुकसान आगामी चुनावों में उनके वोट बैंक पर पड़ेगा। यही कारण है कि जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा जैसे दल इस संवेदनशील मुद्दे पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए हैं और सीधे तौर पर कोई आक्रामक बयान देने से बच रहे हैं।

चिराग पासवान की रणनीति और युवा मतदाताओं पर नजर

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान इस पूरे घटनाक्रम में युवाओं को साधने की जुगत में लगे हुए हैं। हालांकि वे केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी के विस्तार और करीब 15 प्रतिशत युवा मतदाताओं के प्रभाव को देखते हुए वे सरकार के पक्ष में खड़े होने की कीमत पर युवाओं को नाराज नहीं करना चाहते। उन्होंने स्पष्ट किया है कि देश के युवाओं की ऊर्जा को रोका नहीं जा सकता और विरोध के तरीकों के बजाय उनके मुद्दों को समझा जाना चाहिए। पिछले चुनावों में कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बेहद कम रहा है, ऐसे में युवा मतदाता चुनावी नतीजों को बड़ा प्रभावित कर सकते हैं।

जीतन राम मांझी का स्पष्ट और बेबाक रुख

दूसरी ओर, केंद्रीय मंत्री और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के संरक्षक जीतन राम मांझी ने इस पूरे मामले पर बिना किसी लाग-लपेट के केंद्र सरकार का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश का नेतृत्व मजबूत हाथों में है और ऐसी ताकतों से निपटना भली-भांति जानता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मांझी का यह कड़ा रुख उनकी पारंपरिक राजनीति के अनुकूल है, जहाँ उन्हें युवा वर्ग के विशेष समर्थन की चिंता किए बिना अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के तहत फैसले लेने की स्वतंत्रता है।

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