ग्वालियर। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हाल ही में ग्वालियर के महाराजबाड़ा स्थित ऐतिहासिक गोरखी मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने सूफी संत बाबा मंसूर शाह के सालाना उर्स के अवसर पर पारंपरिक रूप से पूजा-अर्चना की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने लिखा कि सिंधिया घराने के मार्गदर्शक और आराध्य संत के श्रीचरणों में श्रद्धा अर्पित करते हुए उन्होंने देशवासियों के सुख-शांति, समृद्धि, प्रगति और सर्वांगीण विकास के लिए प्रार्थना की है।
300 साल पुरानी अनूठी परंपरा और अटूट आस्था
बाबा मंसूर शाह के उर्स में शामिल होकर आशीर्वाद लेना सिंधिया राजपरिवार की सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है। पिछले करीब 300 सालों से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है, जिसके तहत राजपरिवार के मुखिया हर साल गोरखी मंदिर पहुंचकर बाबा की आराधना करते हैं और अपनी गहरी निष्ठा प्रकट करते हैं।
पानीपत के युद्ध से जुड़ा है इतिहास
इस अनूठी परंपरा के इतिहास के पीछे एक गहरा वाकया जुड़ा है। सिंधिया राजवंश के संस्थापक महादजी सिंधिया पानीपत के तीसरे युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिससे उनके परिवार को उनकी सलामती की गहरी चिंता सता रही थी। ऐसे कठिन समय में उनकी पत्नी और मां सूफी संत बाबा मंसूर शाह के दरबार में पहुंची थीं, जहां संत ने उनके सकुशल वापस लौटने का आश्वासन दिया था। कुछ ही दिनों बाद महादजी सिंधिया के सही-سلامत लौटने पर परिवार की इस दरबार में आस्था और अधिक प्रगाढ़ हो गई।
पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, जब महादजी सिंधिया बाबा मंसूर शाह के दरबार में पहुंचे थे, तब संत ने उन्हें आधी रोटी दी थी और आगे चलकर पांच पीढ़ियों तक शासन करने का आशीर्वाद प्रदान किया था। उन्हीं की स्मृति और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में हर साल इस उर्स का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें सिंधिया परिवार के मुखिया विशेष रूप से पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं।

