CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते होगी सुनवाई

CEC Gyanesh kumar Supreme court : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई के लिए सहमति दे दी है. याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के सामूहिक अधिकारों का इस्तेमाल मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले कर रहे हैं. याचिका में सुनवाई पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यों के निर्वहन से रोकने की मांग भी की गई है.

CEC Gyanesh kumar Supreme court:सुप्रीम कोर्ट आज क्या हुआ?

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अदालत में  मंगलवार, 29 सितंबर को याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वकीलों ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की. वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह के साथ अधिवक्ता सुदीप चंद्रा और मुदित गुप्ता ने अदालत में मौखिक रूप से इस मामले का उल्लेख किया.

याचिका में मांग की गई है कि अंतिम फैसला आने तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर अपने कार्यों का निर्वहन करने से रोका जाए. सुप्रीम कोर्ट ने मामले को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है.

याचिका का प्रमुख मुद्दा यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को भारतीय निर्वाचन आयोग के नाम पर ऐसे फैसले लेने का अधिकार है, जिन पर आयोग के अन्य सदस्यों की सहमति या बहुमत का समर्थन न हो.

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि ज्ञानेश कुमार ने कुछ मामलों में आयोग के अध्यक्ष के बजाय पूरे आयोग की तरह अधिकारों का इस्तेमाल किया. याचिका के मुताबिक, चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके अधिकारों का प्रयोग निर्धारित सामूहिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए.

याचिका में निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है. इसमें कहा गया है कि आयोग के फैसलों में दोनों निर्वाचन आयुक्तों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए.

अनुच्छेद 324 और 2023 के कानून का हवाला

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324(1) का हवाला दिया गया है. इसके तहत चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को सौंपी गई है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह अधिकार आयोग को एक संस्था के रूप में मिला है, न कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को व्यक्तिगत तौर पर.

इसके साथ ही याचिका में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का उल्लेख किया गया है.

याचिकाकर्ता के मुताबिक, इस प्रावधान में आयोग के कामकाज और कार्यों के आवंटन के लिए प्रक्रिया तय करने की व्यवस्था है. जहां तक संभव हो, आयोग का काम सर्वसम्मति से होना चाहिए. यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो उसका फैसला बहुमत के आधार पर किया जाना है.

याचिका में इसी कानूनी व्यवस्था के आधार पर सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले आयोग के नाम पर आदेश जारी कर सकते हैं.

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के टीएन शेषन मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया है. याचिका के अनुसार, इस फैसले में निर्वाचन आयुक्तों की निर्णय प्रक्रिया में भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया था.

याचिका में तर्क दिया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का मत अपने आप अंतिम नहीं माना जा सकता और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी भागीदारी मिलनी चाहिए.

याचिकाकर्ता का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए मिलने वाला विशेष संवैधानिक संरक्षण उन्हें अन्य निर्वाचन आयुक्तों से निर्णय लेने के मामले में सर्वोच्च अधिकार नहीं देता. इन दलीलों के आधार पर याचिका में आयोग के सामूहिक स्वरूप को बनाए रखने की मांग की गई है.

चुनाव आयोग के रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग भी की गई है कि कथित एकतरफा फैसलों से जुड़े सभी भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं.

इन रिकॉर्ड में बैठकों की कार्यवाही, एजेंडा, फाइल नोटिंग, अनुमोदन पत्र, पत्राचार, काम के आवंटन और अधिकारों के हस्तांतरण से जुड़े आदेश शामिल हैं. इसके अलावा आईटी एक्सेस रिकॉर्ड, सर्वर लॉग, ऑडिट ट्रेल, डेटाबेस में बदलाव का इतिहास और सॉफ्टवेयर अपडेट से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने की मांग की गई है.

याचिका में 1 अक्टूबर 2025 से लेकर अब तक के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की बात कही गई है. इसमें ERONet और ECINet जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, फॉर्म-6 में कथित बदलाव, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और पश्चिम बंगाल की अपीलीय अदालतों में अपील दाखिल करने से जुड़े दस्तावेज भी शामिल हैं.

याचिका में मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित बदलावों का मुद्दा भी उठाया गया है.

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि विवादित प्रावधान के तहत फॉर्म-6 में कोई और महत्वपूर्ण बदलाव न किया जाए. साथ ही, किसी पात्र नागरिक को केवल इसलिए मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वह विवादित फील्ड में मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं करा पाया है.

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि निर्वाचन आयोग के सामूहिक अधिकारों का इस्तेमाल किस प्रक्रिया के तहत किया जा सकता है और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका की कानूनी सीमा क्या है.

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