Trump India’s voting system: नई दिल्ली/वॉशिंगटन: अमेरिका में इन दिनों चुनावी नियमों को लेकर बहस चल रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और वोटर आईडी सिस्टम का हवाला देते हुए अमेरिका में मतदान के लिए सख्त पहचान नियम लागू करने की वकालत की है. ट्रंप ने कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए फोटो पहचान पत्र का इस्तेमाल होता है, तो अमेरिका में भी ऐसा क्यों नहीं होना चाहिए ?

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक 18 अगस्त 2026 को ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर दावा किया कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से सवाल किया था कि अमेरिका में वैध फोटो आईडी के बिना चुनाव कैसे कराए जाते हैं. ट्रंप ने इसी उदाहरण के आधार पर कांग्रेस से SAVE America Act पारित करने की अपील की.
Trump India’s voting system:ट्रंप ने भारत का उदाहरण क्यों दिया?
ट्रंप का ताजा बयान ऐसे समय आया है जब उनका प्रशासन अमेरिकी चुनावों में वोटर पहचान और नागरिकता की पुष्टि को लेकर नियम सख्त करने पर जोर दे रहा है.
ट्रंप ने भारत के 2024 के आम चुनाव का उदाहरण देते हुए दावा किया कि करीब 64.6 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया और एक प्रतिशत से भी कम लोगों ने डाक के जरिए वोट डाला. उन्होंने कहा कि भारत में मतदाताओं को वैध फोटो पहचान दस्तावेज प्रस्तुत करना होता है.
हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. भारत और अमेरिका की चुनाव व्यवस्था एक जैसी नहीं है. भारत में चुनाव आयोग एक केंद्रीय संवैधानिक संस्था के रूप में लोकसभा और विधानसभा चुनावों का संचालन करता है, जबकि अमेरिका में चुनावों का प्रशासन मुख्य रूप से राज्यों के स्तर पर होता है. इसलिए अमेरिकी चुनावों में पहचान संबंधी नियम भी राज्य-दर-राज्य अलग हैं.
क्या अमेरिका में वोट देने के लिए ID की जरूरत नहीं होती?
ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि अमेरिका में वोट देने के लिए पहचान पत्र की जरूरत नहीं होती.
अमेरिका में 36 राज्यों में मतदान केंद्र पर किसी न किसी प्रकार की पहचान दिखाने का नियम लागू है. वहीं 14 राज्य और वॉशिंगटन डीसी मतदाता की पहचान की पुष्टि के लिए दूसरे तरीके इस्तेमाल करते हैं, जैसे हस्ताक्षर या मतदाता से जुड़ी अन्य जानकारी का रिकॉर्ड से मिलान. यह आंकड़ा अमेरिकी राज्यों की विधानसभाओं और अधिकारियों से जुड़े National Conference of State Legislatures (NCSL) के अप्रैल 2026 के अपडेट में दिया गया है.
इन 36 राज्यों के नियम भी एक जैसे नहीं हैं. कुछ राज्यों में फोटो आईडी अनिवार्य है, जबकि कुछ जगह गैर-फोटो पहचान भी स्वीकार की जाती है. कई राज्यों में यदि मतदाता के पास जरूरी आईडी नहीं है तो वह शपथपत्र, हस्ताक्षर सत्यापन या provisional ballot जैसे विकल्पों का इस्तेमाल कर सकता है.
यही अंतर ट्रंप की बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा है. वह पूरे अमेरिका में एक समान और अधिक सख्त संघीय मानक लागू करना चाहते हैं.
SAVE America Act क्या है?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक ट्रंप जिस कानून का समर्थन कर रहे हैं, उसका आधिकारिक नाम Safeguard American Voter Eligibility Act, यानी SAVE America Act है.
2026 में पेश किए गए H.R.7296 के तहत संघीय चुनावों में मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना होगा. प्रस्तावित कानून मतदान के लिए फोटो पहचान पत्र की आवश्यकता भी रखता है. इसमें राज्यों को ऐसे लोगों की पहचान करने और मतदाता सूची से गैर-नागरिकों को हटाने के लिए प्रक्रिया बनाने का प्रावधान है.
इसके अलावा, प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों में absentee/mail ballot के लिए भी पहचान दस्तावेज से जुड़े प्रावधान हैं। यानी ट्रंप का लक्ष्य सिर्फ मतदान केंद्र पर ID दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मतदाता पंजीकरण से लेकर मतदान तक पूरी प्रक्रिया में पहचान और नागरिकता सत्यापन को मजबूत करना है।
SAVE Act और SAVE America Act में क्या अंतर है?
SAVE Act और SAVE America Act को अक्सर आम लोग एक ही मानते हैं लेकिन दोनों अलग विधायी प्रस्ताव हैं.
2025 का H.R.22 यानी SAVE Act प्रतिनिधि सभा से 220-208 मतों से पारित होकर अप्रैल 2025 में सीनेट पहुंचा था.
इसके बाद 2026 में H.R.7296 के रूप में SAVE America Act पेश किया गया, जिसमें नागरिकता प्रमाण के साथ-साथ फोटो आईडी की जरूरत को भी प्रमुखता दी गई. इस विधेयक की आधिकारिक स्थिति फिलहाल कानून बनने की नहीं है; Congress.gov पर इसे जनवरी 2026 में पेश किए गए विधेयक के रूप में दर्ज किया गया है.
अमेरिका में Voter ID मुद्दा इतना राजनीतिक क्यों है?
अमेरिका में वोटर आईडी का सवाल लंबे समय से Republicans और Democrats के बीच राजनीतिक टकराव का विषय रहा है.
रिपब्लिकन नेताओं का तर्क है कि कड़े पहचान नियम चुनाव में संभावित धोखाधड़ी को रोक सकते हैं और मतदाताओं का चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा बढ़ा सकते हैं.
वहीं डेमोक्रेट्स और नागरिक अधिकार समूहों का तर्क है कि अनिवार्य और सख्त ID नियम ऐसे मतदाताओं के लिए अतिरिक्त बाधा बन सकते हैं, जिनके पास आसानी से स्वीकार की जाने वाली पहचान उपलब्ध नहीं है. NCSL भी इस बहस में दोनों पक्षों के तर्क दर्ज करता है—समर्थक मतदाता पहचान को चुनावी भरोसे और सुरक्षा से जोड़ते हैं, जबकि विरोधी इसे मतदान तक पहुंच पर अतिरिक्त बोझ मानते हैं.
2026 में क्यों बढ़ा दबाव?
ट्रंप का यह अभियान अमेरिकी मिडटर्म चुनावों से कुछ महीने पहले तेज हुआ है. कांग्रेस के चुनावों से पहले चुनावी नियम और मतदाता पहचान का मुद्दा रिपब्लिकन एजेंडे में प्रमुख स्थान रखता है.
जुलाई में ट्रंप ने सीनेट के बहुमत नेता जॉन थ्यून से यहां तक कहा था कि अगस्त अवकाश रद्द कर दिया जाए और सीनेट में वोटिंग नियमों से जुड़े विधेयक को आगे बढ़ाया जाए. लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में 53 सीटें होने के बावजूद 60 वोट की प्रभावी जरूरत के कारण विधेयक को आगे बढ़ाना आसान नहीं है. ट्रंप ने फिलिबस्टर नियम को बदलने या किसी दूसरे रास्ते से विधेयक पारित कराने का दबाव भी बनाया है.
भारत की चुनाव व्यवस्था को लेकर ट्रंप का संदेश क्या है?
ट्रंप के बयान का मूल संदेश यह है कि अगर भारत जैसा दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मतदाता पहचान के लिए सख्त व्यवस्था अपना सकता है, तो अमेरिका भी ऐसा कर सकता है. लेकिन भारत और अमेरिका के चुनावी मॉडल में कई बुनियादी अंतर हैं. भारत में चुनाव आयोग राष्ट्रीय स्तर पर मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम और मतदान प्रक्रिया की निगरानी करता है. अमेरिका में चुनाव प्रशासन काफी हद तक राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। यही वजह है कि अमेरिका में एक समान राष्ट्रीय वोटर आईडी व्यवस्था लागू करना केवल राजनीतिक इच्छा का सवाल नहीं, बल्कि संघीय बनाम राज्य अधिकारों और मतदान के अधिकार से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा भी है.
ट्रंप के बयान पर भारत में भी सियासत
ट्रंप के बयान के बाद भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई है. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें अमेरिका भेज दिया जाना चाहिए. उन्होंने चुनाव आयोग और भारतीय चुनाव प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस की पुरानी आपत्तियों के संदर्भ में ट्रंप की टिप्पणी पर सवाल उठाया.
इस तरह अमेरिकी चुनावी कानून को लेकर शुरू हुई बहस का असर भारत की घरेलू राजनीति तक भी पहुंच गया है.
क्या ट्रंप का SAVE America Act आसानी से पास हो जाएगा?
फिलहाल इसकी राह आसान नहीं दिखती. SAVE America Act को सीनेट की मंजूरी की जरूरत है और इसके लिए कम से कम एक्ट के पक्ष में 60 वोट होना जरुरी है लेकिन रिपब्लिकन पार्टी के पास केवल 53 सीटें हैं, इसलिए विपक्षी डेमोक्रेट्स के समर्थन के बिना विधेयक को आगे बढ़ाना मुश्किल है.
यही कारण है कि ट्रंप लगातार इस मुद्दे को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला रहे हैं. भारत का उदाहरण देकर उनका प्रयास यह संदेश देने का है कि सख्त मतदाता पहचान व्यवस्था दुनिया के बड़े लोकतंत्र में पहले से काम कर रही है और अमेरिका में भी इसे लागू किया जा सकता है.
कुल मिलकर देखा जाये तो ट्रंप का भारत का उदाहरण देना केवल वोटर ID की तारीफ नहीं, बल्कि अमेरिका की चुनाव व्यवस्था में बड़े बदलाव के लिए राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी है. भारत में फोटो पहचान के साथ चुनाव कराने की व्यवस्था को ट्रंप अमेरिकी मतदाता पहचान कानून के पक्ष में तर्क के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन अमेरिका की संघीय संरचना, राज्यों के अलग-अलग चुनावी कानून और रिपब्लिकन-डेमोक्रेट के बीच तीखी राजनीतिक असहमति के कारण SAVE America Act का कानून बनने की राह अभी आसान नहीं है.

