कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार ने आपातकाल (इमरजेंसी) के काले दौर के दौरान जेल की यातनाएं झेलने वाले राज्य के कुल 325 लोगों को सम्मानित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। राज्य सचिवालय में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नेताओं ने घोषणा की कि इन सभी लोकतंत्र सेनानियों को प्रत्येक माह दस हजार रुपये की आर्थिक पेंशन, सरकारी बसों में पूर्ण रूप से नि:शुल्क यात्रा की सुविधा और सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए एक हजार रुपये की मासिक मेडिकल सहायता प्रदान की जाएगी। सरकार का यह कदम उन वीर सेनानियों के प्रति सच्ची कृतज्ञता है जिन्होंने देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए अंचलित और अकल्पनीय कष्ट सहे थे।
लोकतंत्र सेनानी सम्मान और लाभार्थियों के निधन पर मिलने वाली सहायता
राज्य सरकार द्वारा चिन्हित किए गए इन 325 व्यक्तियों को आधिकारिक तौर पर 'पश्चिमबंग लोकतंत्र सेनानी सम्मान' के लिए चयनित किया गया है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यदि इनमें से किसी भी सम्मानित लाभार्थी का दुखद निधन हो जाता है, तो यह वित्तीय और चिकित्सा लाभ उनके जीवनसाथी (पति या पत्नी) को प्रदान किया जाएगा। वर्तमान सरकार का मानना है कि देश के लिए संघर्ष करने वाले इन स्वतंत्रता और लोकतंत्र सेनानियों के आदर्शों पर ही राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था आगे बढ़ रही है।
आपातकाल के काले दिनों का इतिहास और प्रमुख राजनीतिक कारण
देश में 25 जून 1975 से लेकर 21 मार्च 1977 तक कुल इक्कीस महीनों के लिए आंतरिक आपातकाल लागू किया गया था, जिसकी घोषणा तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सिफारिश पर की गई थी। इस इमरजेंसी के पीछे मुख्य वजहों में 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया जाना, लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में चल रहा 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन और देश की गंभीर आर्थिक व राजनीतिक अस्थिरता शामिल थी।
इमरजेंसी के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन और प्रेस सेंसरशिप
आपातकाल के उस दौर में नागरिकों के संविधान द्वारा प्रदत्त सभी मौलिक अधिकार (जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पूरी तरह से निलंबित कर दिए गए थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मोरारजी देसाई सहित देश के तमाम बड़े विपक्षी नेताओं को रातों-रात जेल में डाल दिया गया था। इसके साथ ही भारतीय प्रेस और मीडिया पर अत्यंत कड़ा प्रतिबंध व सेंसरशिप लगा दी गई थी, जिसके तहत अखबारों को छापने से पहले सरकारी अनुमति लेनी पड़ती थी।
वर्ष 1977 में इमरजेंसी का अंत और जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत
जनवरी 1977 में अचानक आम चुनावों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया और 21 मार्च 1977 को आधिकारिक रूप से आपातकाल समाप्त हो गया। इसके बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। वर्तमान में केंद्र और कई राज्यों की सरकारें इस काले अध्याय की याद में हर साल 25 जून को 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाती हैं।

