Delimitation Bill DMK नई दिल्ली : परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को लेकर तमिलनाडु की प्रमुख विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है. पार्टी नेता और तमिलनाडु के पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने साफ कहा है कि डीएमके शुरू से परिसीमन के मौजूदा प्रस्ताव का विरोध करती रही है और भविष्य में भी उसका विरोध जारी रहेगा.
उनका यह बयान ऐसे समय में आया है, जब पिछले कुछ दिनों से यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि डीएमके इस मुद्दे पर अपना रुख नरम कर सकती है. उदयनिधि के बयान के बाद इन अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है.
Delimitation Bill DMK- ‘यह कोई नया मुद्दा नहीं है’
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि केंद्र सरकार परिसीमन के मुद्दे को ऐसे पेश कर रही है, जैसे यह पहली बार सामने आया हो। उन्होंने कहा कि डीएमके का रुख पहले भी स्पष्ट था और आज भी वही है।
उन्होंने कहा,
“यह कोई नया मुद्दा नहीं है। केंद्र सरकार इसे ऐसे पेश कर रही है जैसे यह पहली बार आया हो। डीएमके ने हमेशा परिसीमन का विरोध किया है और आगे भी करती रहेगी।”
INDIA गठबंधन के लिए अहम संकेत
डीएमके के इस बयान को विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. पिछले कुछ समय से यह चर्चा थी कि पार्टी परिसीमन बिल पर केंद्र सरकार का समर्थन कर सकती है. इससे विपक्षी दलों, खासकर INDIA गठबंधन के भीतर असहजता बढ़ गई थी.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उदयनिधि स्टालिन के ताजा बयान से विपक्षी दलों को यह संदेश गया है कि डीएमके फिलहाल अपने पुराने रुख से पीछे हटने के मूड में नहीं है.
राहुल गांधी ने भी किया था विरोध
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी खुलकर अपनी बात रख चुके हैं. तमिलनाडु दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि राज्य की सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों को परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करना चाहिए.
राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि जो भी दल इस प्रस्ताव का समर्थन करेगा, वह तमिलनाडु के लोगों के साथ विश्वासघात करेगा. उन्होंने ऐसे दलों को तमिल भाषा के शब्द ‘एट्टाप्पन’ (गद्दार) से भी संबोधित किया था.
क्यों बदले थे डीएमके के रुख की चर्चा?
दरअसल, कुछ समय पहले ऐसी खबरें सामने आई थीं कि यदि केंद्र सरकार परिसीमन विधेयक में कुछ महत्वपूर्ण संशोधन करती है, तो डीएमके समर्थन पर विचार कर सकती है.
रिपोर्ट्स के अनुसार पार्टी ने तीन प्रमुख शर्तें रखी थीं, जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि डीएमके अपने रुख में नरमी ला रही है. हालांकि अब उदयनिधि स्टालिन के बयान के बाद पार्टी ने सार्वजनिक रूप से विरोध की नीति दोहरा दी है.
डीएमके की तीन प्रमुख मांगें क्या थीं?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डीएमके ने परिसीमन को लेकर तीन अहम सुझाव दिए थे—
- 1971 की जनगणना को आधार बनाया जाए, न कि 2011 की जनगणना को. पार्टी चाहती है कि अगले 25 वर्षों तक इसी आधार को लागू रखा जाए.
- सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत वृद्धि की जाए, ताकि किसी राज्य के साथ असमानता न हो.
- विधेयक में स्पष्ट उल्लेख किया जाए कि किस राज्य में कितनी सीटें बढ़ाई जाएंगी, जिससे भविष्य में किसी तरह का भ्रम न रहे.
लोकसभा में क्यों अहम है डीएमके का समर्थन?
डीएमके संसद में मजबूत उपस्थिति रखने वाली पार्टी है. उसके लोकसभा में 22 सांसद और राज्यसभा में 8 सदस्य हैं. ऐसे में किसी भी बड़े संवैधानिक या राजनीतिक विधेयक पर उसका रुख महत्वपूर्ण माना जाता है.
यही वजह है कि परिसीमन बिल पर डीएमके की स्थिति को केंद्र सरकार और विपक्ष, दोनों ही गंभीरता से देख रहे हैं.
सरकार का क्या है प्रस्ताव?
केंद्र सरकार परिसीमन प्रक्रिया के तहत 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण करना चाहती है. प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर लगभग 850 किए जाने की योजना है.
इससे पहले संसद में इस विषय पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संकेत दिया था कि राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए कुछ मुद्दों पर विचार किया जा सकता है. हालांकि अंतिम स्वरूप क्या होगा, यह संसद में विधेयक पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा.
राजनीतिक महत्व
तमिलनाडु में परिसीमन का मुद्दा लंबे समय से संवेदनशील रहा है. दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए सीटों के पुनर्वितरण में उनके साथ किसी प्रकार का नुकसान नहीं होना चाहिए. ऐसे में डीएमके का ताजा बयान आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस को और तेज कर सकता है.

