पेपर लीक पर अब 10 साल की जेल, ₹10 करोड़ तक जुर्माना; जानिए नए कानून की बड़ी बातें

Public Examination Amendment Bill 2026 : देशभर में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों पर सख्त कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने लोकसभा में ‘पब्लिक एग्ज़ामिनेशन (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026’ पेश किया है. इस संशोधन का उद्देश्य प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करना, संगठित पेपर लीक गिरोहों पर शिकंजा कसना और दोषियों को कड़ी सजा दिलाना है.

यह संशोधन दो साल पहले लागू किए गए पेपर लीक विरोधी कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए लाया गया है. हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाओं और छात्रों के व्यापक विरोध के बाद सरकार ने कानून को और कठोर बनाने का फैसला किया है.

Public Examination Amendment Bill 2026: पेपर लीक करने वालों को अब 10 साल तक की जेल

संशोधन बिल के अनुसार, पेपर लीक या परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल के मामलों में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के लिए अधिकतम सजा 5 साल से बढ़ाकर 10 साल करने का प्रस्ताव रखा गया है.

इसके साथ ही आर्थिक दंड भी काफी बढ़ाया गया है. पहले जहां अधिकतम जुर्माना ₹10 लाख था, वहीं अब इसे बढ़ाकर ₹50 लाख तक करने का प्रस्ताव है.

अधिकारियों और मैनेजमेंट पर भी होगी सख्ती

अगर किसी परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के डायरेक्टर, वरिष्ठ प्रबंधन या अधिकारी पेपर लीक या अनियमितता में शामिल पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होगी.

संशोधन के तहत ऐसे अधिकारियों के लिए अधिकतम जेल की सजा 3 साल से बढ़ाकर 5 साल करने का प्रस्ताव रखा गया है।

संगठित गिरोहों पर ₹10 करोड़ तक का जुर्माना

सरकार ने पेपर लीक के पीछे सक्रिय संगठित अपराध सिंडिकेट पर भी सख्ती दिखाई है.

प्रस्तावित कानून के अनुसार—

  • संगठित अपराध के मामलों में अधिकतम सजा 5 साल से बढ़ाकर 7 साल होगी.
  • अधिकतम जुर्माना ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ तक किया जाएगा.

इसका उद्देश्य पेपर लीक को एक संगठित आपराधिक कारोबार बनने से रोकना है.

स्पेशल टास्क फोर्स करेगी जांच

बिल में जांच प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के गठन का प्रावधान किया गया है.

हालांकि केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर किसी मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी को भी सौंप सकती है, लेकिन नए प्रस्ताव के तहत सरकार विशेष जांच दल गठित कर सकेगी.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच दो महीने के भीतर पूरी करने का लक्ष्य तय किया गया है ताकि मामलों में अनावश्यक देरी न हो.

राज्यों में बनेंगे स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट

पेपर लीक के मामलों का जल्द निपटारा सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है.

इन अदालतों में—

  • रोजाना सुनवाई होगी.
  • चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का लक्ष्य रहेगा.

इससे वर्षों तक मुकदमे लंबित रहने की समस्या कम हो सकती है.

स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की होगी नियुक्ति

बिल में राज्यों और केंद्र सरकार को एक या अधिक स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त करने का अधिकार देने का प्रस्ताव है.

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पेपर लीक जैसे संवेदनशील मामलों की प्रभावी पैरवी हो और दोषियों को जल्द सजा मिल सके.

अपील के लिए भी तय होगी समय सीमा

संशोधन बिल में अपील प्रक्रिया को भी समयबद्ध बनाया गया है.

  • फास्ट ट्रैक कोर्ट के फैसले के खिलाफ 30 दिनों के भीतर हाई कोर्ट में अपील करनी होगी.
  • विशेष परिस्थितियों में अधिकतम 90 दिनों तक की देरी स्वीकार की जा सकेगी.
  • हाई कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ अपीलों की सुनवाई करेगी.
  • अपील का निपटारा भी तीन महीने के भीतर करने का लक्ष्य रखा गया है.
छात्रों और परीक्षा प्रणाली को मिलेगा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संशोधन प्रभावी ढंग से लागू होता है तो प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी, पेपर लीक करने वाले संगठित गिरोहों पर अंकुश लगेगा और छात्रों का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा मजबूत होगा. फास्ट ट्रैक कोर्ट, समयबद्ध जांच और भारी आर्थिक दंड जैसे प्रावधान कानून को पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी बना सकते हैं.

Public Examination Amendment Bill 2026 का उद्देश्य केवल दोषियों को कठोर सजा देना नहीं, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाना है. 10 साल तक की जेल, ₹10 करोड़ तक का जुर्माना, स्पेशल टास्क फोर्स, फास्ट ट्रैक कोर्ट और समयबद्ध जांच जैसे प्रावधान यह संकेत देते हैं कि केंद्र सरकार अब पेपर लीक को राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर संगठित अपराध मानते हुए उससे सख्ती से निपटने की तैयारी में है.हलांकि पहले से  मौजूद नकल विरोधी कानून भी कम कड़े नहीं हैं लेकिन इसके क्रियान्यवन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं . विपक्ष का आरोप है कि सरकार पहले से मौजूद कानून को ही सख्ती से लागू करती तो समस्या का समाधान हो सकता था , संसद में नया कानून लाने की आवश्यकता नहीं थी.

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