ट्रंप के ‘चक्रव्यूह’ में फंसा पाकिस्तान! क्या शांति दूत बन रहे शहबाज शरीफ अब अपनों के बीच ही बनेंगे ‘खलनायक’?

Trump Abraham Accords :इस्लामाबाद / वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कूटनीतिक प्रस्ताव ने पाकिस्तान के सामने ऐसी दुविधा खड़ी कर दी है, जहां आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति बनती नजर आ है. पाकिस्तान के लिए इस समय संकट यह है कि अगर वह ट्रंप की बात मानता है तो घरेलू स्तर पर घिर जाएगा और अगर इनकार करता है तो अपने सुगर डैडी महाशक्ति अमेरिका की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने वीकेंड पर पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों के नेताओं के साथ एक हाई-लेवल कॉन्फ्रेंस कॉल की, जिसने इस्लामाबाद के गलियारों में हलचल तेज कर दी है.

Trump Abraham Accords:ट्रंप की कॉल और पसरा सन्नाटा

अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘एक्सियोस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने इस कॉल के दौरान मुस्लिम देशों से अपील की कि वे ईरान युद्ध के बाद अब ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) का हिस्सा बनें. इस प्रस्ताव का सीधा और साफ मतलब यह है कि पाकिस्तान समेत अन्य मुस्लिम देश इज़रायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में औपचारिक मान्यता दें.

बताया जा रहा है कि ट्रंप के मुंह से यह बात सुनते ही कॉन्फ्रेंस कॉल पर कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया. माहौल को भांपते हुए ट्रंप ने मजाकिया लहजे में पाकिस्तान और अन्य देशों के नेताओं से पूछा भी कि “क्या वे अभी भी लाइन पर बने हुए हैं?”

आखिर क्यों कूटनीतिक जाल में फंस गया पाकिस्तान?

पाकिस्तान के सामने इस समय दोहरी कूटनीतिक चुनौती है. एक तरफ शहबाज शरीफ सरकार खुद को अमेरिका और ईरान के बीच एक ‘शांति दूत’ (Peace Broker) के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है ताकि मुस्लिम जगत में उसका कद बढ़ सके. वहीं दूसरी ओर, ट्रंप के इस सीधे प्रस्ताव ने उसकी इस रणनीति पर पानी फेर दिया है.

यदि पाकिस्तान इस समझौते को स्वीकार करता है, तो उसे अपनी दशकों पुरानी पारंपरिक विदेश नीति को छोड़ना होगा. वहीं, इनकार करने की सूरत में अमेरिका के साथ उसके संबंध पूरी तरह पटरी से उतर सकते हैं, जिसकी मार पहले से ही आर्थिक तंगी झेल रहे पाकिस्तान को और भारी पड़ेगी.

बारूद के ढेर पर बैठी है शहबाज सरकार

पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द उसका घरेलू मोर्चा है. फिलिस्तीन का मुद्दा पाकिस्तान के आम अवाम के लिए हमेशा से बेहद संवेदनशील और भावनात्मक रहा है. बिना किसी स्पष्ट शांति समझौते या शर्तों के इज़रायल को गले लगाना, शहबाज सरकार और पाकिस्तान सेना के लिए बारूद के ढेर पर बैठने जैसा है. जनता का गुस्सा कभी भी देश में एक बड़ा राजनीतिक विस्फोट कर सकता है. यही वजह है कि इसे देश की मौजूदा हुकूमत के लिए एक ‘राजनीतिक आत्मघाती’ कदम माना जा रहा है.

क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स और इमरान खान का रुख?

गौऱतलब है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान साल 2020 में अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत की थी. उस समय व्हाइट हाउस में इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. हालांकि, पाकिस्तान ने शुरू से ही इस समझौते से दूरी बनाए रखी थी और इसे ‘नए मध्य पूर्व’ की अवधारणा के खिलाफ बताया था.

उस वक्त के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी इस समझौते में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया था. इमरान खान का तर्क था कि इज़रायल को मान्यता देना पाकिस्तान के ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ (दो-राष्ट्र सिद्धांत) और उसके बुनियादी सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ होगा.

ट्रंप का मुस्लिम देशों पर बढ़ता दबाव

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि उन्होंने कतर, सऊदी अरब, पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन और तुर्की जैसे बड़े मुस्लिम देशों से आग्रह किया है कि वे इज़रायल के साथ अपने संबंधों को सामान्य करें. ट्रंप का मानना है कि मध्य पूर्व में ईरान के साथ जारी संघर्ष को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए इन देशों का आगे आना जरूरी है. अब देखना यह होगा कि चारों तरफ से दबाव झेल रही शहबाज शरीफ सरकार ट्रंप के इस ‘गूगली’ का सामना कैसे करती है ?

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