इस्लामाबाद। बलूचिस्तान, दक्षिण एशिया का एक ऐतिहासिक और खनिज संसाधनों से भरपूर क्षेत्र है, जो वर्तमान में पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान के बीच विभाजित है। पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत क्षेत्रफल के हिसाब से देश का सबसे बड़ा प्रांत है, हालांकि इसकी आबादी थोड़ी कम है। इतिहासकारों के अनुसार, ब्रिटिश शासन के दौरान यहां कई रियासतें मौजूद थीं, जिनमें कलात रियासत सबसे प्रमुख थी। 11 अगस्त 1947 को, भारत और पाकिस्तान के औपचारिक गठन से ठीक पहले, कलात के खान ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। इसके बाद कुछ महीनों तक कलात ने स्वयं को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में संचालित किया और पाकिस्तान के साथ अपने भविष्य को लेकर बातचीत जारी रखी।
पाकिस्तान की स्थापना के बाद कलात और नवगठित पाकिस्तान के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं। पाकिस्तान चाहता था कि कलात उसके साथ विलय कर ले, जबकि कलात के शासक शुरुआत में अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखना चाहते थे। आखिरकार, 27 मार्च 1948 को, कलात के तत्कालीन खान, अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। पाकिस्तान का आधिकारिक पक्ष इस विलय को एक स्वैच्छिक और कानूनी प्रक्रिया मानता है, लेकिन कई बलूच राष्ट्रवादी नेताओं और कुछ इतिहासकारों का दावा है कि यह फैसला राजनीतिक और सैन्य दबाव में लिया गया था। इसी मूलभूत विवाद के कारण आज भी इस विषय पर अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं, और यह बलूचिस्तान के मौजूदा संघर्षों की जड़ में है।
विलय के तुरंत बाद ही इसका विरोध शुरू हो गया। कलात के खान के भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस विलय को अस्वीकार कर दिया और पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया। तब से लेकर आज तक, बलूचिस्तान में समय-समय पर कई अलगाववादी आंदोलन और सशस्त्र संघर्ष हुए हैं। 1950 के दशक, 1960 के दशक, 1970 के दशक और फिर 2000 के दशक के बाद भी बलूच अलगाववादी संगठनों और पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों के बीच संघर्ष लगातार जारी रहा है। बलूच संगठनों का आरोप है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों (जैसे गैस, तांबा, सोना) का पर्याप्त लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता, और उन्हें विकास से वंचित रखा जाता है। वहीं, पाकिस्तान सरकार का कहना है कि वह क्षेत्र के विकास और सुरक्षा के लिए लगातार काम कर रही है। आज बलूचिस्तान पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक माना जाता है। 1948 में हुए विलय की वैधता और परिस्थितियों को लेकर विवाद अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान इसे अपने संघ का वैध हिस्सा मानता है, जबकि कई बलूच राष्ट्रवादी संगठन ऐतिहासिक आधार पर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हैं और अपनी आवाज विभिन्न माध्यमों से उठाते रहते हैं।

