भोपाल। एक बेकसूर इंजीनियर को हवाई सफर की तैयारी करना इस कदर भारी पड़ गया कि उसे बिना किसी जुर्म के सलाखों के पीछे 57 दिन काटने पड़े। इस गंभीर लापरवाही पर अब हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार करते हुए राज्य की फॉरेंसिक जांच व्यवस्था को आड़े हाथों लिया है और सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना ठोंक दिया है। यह पूरा मामला एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत दर्ज की गई एक गलत कार्रवाई से जुड़ा है, जिसने एक सम्मानित नागरिक के जीवन को झकझोर कर रख दिया।
प्रशासनिक ढांचे और संसाधनों की कमी पर हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के जस्टिस दीपक खोत ने व्यवस्था पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अगर राज्य की फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं के पास जांच के लिए जरूरी उपकरण ही मौजूद नहीं हैं, तो फिर इतने बड़े बुनियादी ढांचे और विशेषज्ञ अधिकारियों की फौज तैनात करने का क्या औचित्य है। अदालत ने बेहद सख्त लहजे में माना कि सरकारी तंत्र और संसाधनों की इस घोर कमी के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को करीब दो महीने तक जेल की कालकोठरी में रहना पड़ा, जो सीधे तौर पर संविधान द्वारा दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का खुला उल्लंघन है। अदालत ने मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वे एक महीने के भीतर राज्य की सभी क्षेत्रीय फॉरेंसिक साइंस लैब्स का व्यक्तिगत रूप से निरीक्षण करें और वहां स्टाफ व आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
अमचूर-मसाले को समझ लिया ड्रग्स: क्या था पूरा वाकया
इस अजीबोगरीब और दर्दनाक मामले की शुरुआत 7 मई 2010 को हुई थी, जब ग्वालियर के रहने वाले पेशेवर इंजीनियर अजय सिंह दिल्ली जाने के लिए भोपाल के राजा भोज एयरपोर्ट पहुंचे थे। सुरक्षा जांच के दौरान सुरक्षाकर्मियों को उनके बैग में अमचूर और गरम मसाले के पैकेट मिले। वहां लगी 'एक्सप्लोसिव ट्रेस डिटेक्टर' मशीन की एक तकनीकी खराबी या गलत कमान के कारण अलार्म बज उठा और मशीन ने उस साधारण मसाले को खतरनाक हेरोइन ड्रग्स के रूप में चिन्हित कर दिया। इसके बाद फौरन हरकत में आई सीआईएसएफ (CISF) ने गांधीनगर पुलिस को मामले की जानकारी दी और इंजीनियर को हिरासत में ले लिया गया।
लचर फॉरेंसिक व्यवस्था के कारण 57 दिन बाद मिला इंसाफ
पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए 10 मई 2010 को इस संदिग्ध सैंपल को जांच के लिए क्षेत्रीय फॉरेंसिक लैब भेजा, लेकिन लैब ने यह कहकर अपने हाथ खड़े कर दिए कि उनके पास इस तरह की जांच (MDET) के लिए जरूरी तकनीकी सुविधाएं ही नहीं हैं। इसके बाद 19 मई को सैंपल को हैदराबाद की केंद्रीय प्रयोगशाला भेजा गया, जहां की विस्तृत रिपोर्ट में साफ हुआ कि अजय सिंह के बैग में कोई मादक पदार्थ नहीं बल्कि घरेलू मसाले ही थे। इस पूरी कछुआ चाल वाली प्रक्रिया और फॉरेंसिक रिपोर्ट आने में हुई देरी की वजह से निर्दोष अजय सिंह को आखिरकार 2 जुलाई 2010 को जेल से रिहाई मिल सकी, जिसके एवज में अब अदालत ने उन्हें मुआवजा देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

