दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को JNU के स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद Umar Khalid की अंतरिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी. उमर खालिद ने अपनी बीमार मां की देखभाल करने और अपने चाचा की मौत के बाद के रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए जमानत मांगी थी.
यह आदेश दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज समीर बाजपेयी ने पास किया.
Umar Khalid पर दिल्ली दंगे 2020 के “मास्टरमाइंड” होने का है आरोप
उमर खालिद और दूसरों पर 2020 के दंगों के “मास्टरमाइंड” होने के आरोप में अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट (UAPA), एक एंटी-टेरर कानून, और इंडियन पीनल कोड (IPC) के प्रोविज़न के तहत केस किया गया था. इन दंगों में नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में 53 लोग मारे गए थे और 700 से ज़्यादा घायल हुए थे.
यह हिंसा सिटिज़नशिप (अमेंडमेंट) एक्ट (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी.
UAPA में भी “ज़मानत नियम है,जेल एक एक्सेप्शन है”-शरजील मामले में बोला सुप्रीम कोर्ट
यह नया झटका उमर खालिद के लिए उम्मीद की एक किरण के एक दिन बाद आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी के अपने उस फैसले की आलोचना की थी जिसमें उन्हें और एक्टिविस्ट शरजील इमाम को कथित तौर पर बड़ी साज़िश से जुड़े मामले में ज़मानत देने से मना कर दिया गया था.
टॉप कोर्ट की बेंच ने ज़ोर देकर कहा कि अनलॉफुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट (UAPA) के तहत केस में भी “ज़मानत नियम है और जेल एक एक्सेप्शन है”.
जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्जल भुयान की बेंच ने, नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) द्वारा जांचे जा रहे एक नार्को-टेरर केस में जम्मू-कश्मीर के रहने वाले सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को ज़मानत देते हुए, इस साल की शुरुआत में दिल्ली दंगों की साज़िश के केस में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया वाली दो जजों की बेंच द्वारा अपनाए गए तर्क पर “गंभीर आपत्ति” जताई थी.
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 5 जनवरी का फ़ैसला यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम केए नजीब (2021) में तीन जजों की बड़ी बेंच द्वारा तय किए गए ज़रूरी सिद्धांतों को सही ढंग से लागू करने में नाकाम रहा, जिसने माना था कि लंबे समय तक जेल में रहना और ट्रायल में देरी UAPA के सेक्शन 43D(5) के तहत ज़मानत पर कानूनी पाबंदियों को खत्म कर सकती है.
खुली अदालत में फैसले के मुख्य हिस्से पढ़ते हुए, जस्टिस भुयान ने कहा: “ज़मानत कोई खोखला कानूनी नारा नहीं है. यह आर्टिकल 21 से निकला एक संवैधानिक सिद्धांत है, और बेगुनाही का अंदाज़ा कानून के राज से चलने वाले किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद है.”
बेंच ने आगे कहा: “UAPA के तहत भी, बेल नियम है और जेल एक एक्सेप्शन है. किसी खास केस में बेल से इनकार सिर्फ़ उस खास केस के फैक्ट्स के आधार पर ही किया जा सकता है.”
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