मुंबई: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के विषय पर समूह के शीर्ष नेतृत्व के भीतर मतभेद गहरे होते जा रहे हैं। टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा इस लिस्टिंग के पक्ष में नहीं हैं, जबकि ट्रस्ट के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े नियमों का हवाला देते हुए सार्वजनिक निर्गम (IPO) लाने पर जोर दे रहे हैं। 1 जुलाई 2026 की समय सीमा नजदीक आने के कारण यह विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है।
टाटा ट्रस्ट में आंतरिक मतभेद और भविष्य की रणनीति
टाटा संस के भविष्य को लेकर ट्रस्ट के भीतर दो स्पष्ट विचारधाराएं उभरकर सामने आई हैं। एक ओर वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह जैसे ट्रस्टी हैं जो कंपनी में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए लिस्टिंग को अनिवार्य मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नोएल टाटा का मानना है कि कंपनी को निजी (क्लोजली हेल्ड) रखना ही समूह के हितों के लिए बेहतर है। इस विवाद के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
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नियंत्रण खोने का डर: नोएल टाटा को अंदेशा है कि शेयर बाजार में लिस्ट होने से टाटा संस पर टाटा ट्रस्ट की पकड़ कमजोर पड़ सकती है।
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गारंटी पर विवाद: रिपोर्ट के अनुसार, नोएल टाटा ने चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन से लिस्टिंग न होने का आश्वासन मांगा था, जिसे चंद्रशेखरन ने नियामक मजबूरी बताते हुए देने से इनकार कर दिया।
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वोटिंग में देरी: इसी खींचतान के कारण एन. चंद्रशेखरन के अगले कार्यकाल की नियुक्ति पर होने वाली आधिकारिक वोटिंग को भी फिलहाल टालना पड़ा है।
आरबीआई के कड़े नियम और नियामक चुनौतियां
टाटा समूह के लिए सबसे बड़ी चुनौती बैंकिंग नियामक आरबीआई के वे नियम हैं जो बड़े शैडो बैंकों (NBFC) पर लागू होते हैं। इन नियमों के कारण टाटा संस के पास अब विकल्प सीमित रह गए हैं:
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अनिवार्य लिस्टिंग: नए नियमों के तहत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति वाली एनबीएफसी को 'सिस्टमैटिकली इम्पोर्टेन्ट' माना जाता है और उन्हें शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना ही पड़ता है।
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समय सीमा: आरबीआई ने टाटा संस को लिस्ट होने के लिए जुलाई 2026 तक का समय दिया है और सूत्रों की मानें तो नियामक किसी भी प्रकार की विशेष छूट देने के पक्ष में नहीं है।
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पिछला अनुभव: साल 2022 में भी समूह ने ऋण पुनर्गठन के जरिए लिस्टिंग से बचने की कोशिश की थी, लेकिन अब नियामक ने ऐसे सभी तकनीकी रास्तों को बंद कर दिया है।
शापूरजी पालोनजी ग्रुप और बाजार पर संभावित असर
यदि टाटा संस का आईपीओ बाजार में आता है, तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक होगी। इसका सबसे अधिक प्रभाव मिस्त्री परिवार के मालिकाना हक वाले शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप पर पड़ेगा:
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हिस्सेदारी का मूल्य: टाटा संस में मिस्त्री परिवार की 18.4% हिस्सेदारी है, जिसका मूल्य लिस्टिंग के बाद स्पष्ट रूप से सामने आ जाएगा।
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कर्ज से मुक्ति: भारी कर्ज में डूबे एसपी ग्रुप के लिए यह लिस्टिंग 'गेम चेंजर' साबित हो सकती है, क्योंकि इससे उनकी फंसी हुई संपत्ति की वैल्यू अनलॉक होगी।
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बोर्ड मीटिंग पर नजर: आगामी 8 मई को होने वाली टाटा ट्रस्ट्स की बैठक में नए ट्रस्टी नॉमिनी और लिस्टिंग के प्रस्ताव पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिससे आगे की राह साफ होगी।

