किसी बैंक का डूबना नई बात नहीं है. इंडिया सहित कई देशों में बैंकों के डूबने के कई मामले आ चुके हैं. लेकिन, अमेरिका में सिलिकॉन वैली बैंक के डूबने की खबर ने पूरी दुनिया के फाइनेंशियल मार्केट में तहलका मचा दिया है. आखिर इंडिया से हजारों किलोमीटर दूर इस बैंक के डूबने की इतनी चर्चा क्यों हो रही है? आखिर यह बैंक क्यों डूब गया? इस बैंक के डिपॉजिटर्स का क्या होगा? क्या दूसरे बैंकों पर भी खतरा मंडरा रहा है?
अमेरिका का 16वां सबसे बड़ा बैंक
सिलिकॉन वैली बैंक (SVB)अमेरिका का 16वां सबसे बड़ा बैंक था. अमेरिका खासकर कैलिफोर्निया स्थित स्टार्टअप्स में इसकी बहुत अच्छी पैठ थी. इसने उन स्टार्टअप्स(STARTUP) को ज्यादा लोन दिया था, जिन्होंने वेंचर फंडों की आर्थिक मदद हासिल की थी. यह स्टार्टअप्स भी अपना डिपॉजिट सिलिकॉन वैली बैंक में रखना पंसद करते थे. उनके एग्जिक्यूटिव्स का भी यह पसंदीदा बैंक था.
खतरे को भांप नहीं सका सिलिकॉन वैली बैंक
इंटरेस्ट रेट(INTEREST RATE) बढ़ने का सिलसिला अमेरिका में पिछले साल की शुरुआत में शुरू हुआ था. अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने इनफ्लेशन को काबू में करने के लिए एक के बाद एक इंटरेस्ट रेट्स बढ़ाने के फैसले लेने शुरू किए. इससे फाइनेंशियल मार्केट में लिक्विडिटी (पैसा) घटने लगी. इससे स्टार्टअप्स के लिए भी फंड जुटाना मुश्किल हो गया. पैसे की कमी का असर उनके ऑपरेशन पर पड़ना शुरू हो गया. इससे उनकी वैल्यूएशन काफी घट गई. यह सिलिकॉन वैली बैंक के लिए खतरे की घंटी थी लेकिन वह इस खतरे को भांप नहीं सका.
डिपॉजिट बढ़ाने के लिए इंटरेस्ट रेट बढ़ाए
SVB ने कारोबार बढ़ाने के लिए दूसरे बैंकों के मुकाबले ज्यादा इंटरेस्ट रेट्स पर डिपॉजिट जुटाना शुरू कर दिया. इससे उसका डिपॉजिट तो बढ़ गया लेकिन डिपॉजिटर्स को ज्यादा इंटरेस्ट रेट देने में उसे दिक्कत आने लगी. वजह यह थी कि इंटरेस्ट रेट्स बढ़ने की वजह से फाइनेंशियल मार्केट की स्थितियां बदलने लगी थीं. मुश्किल में फंसने से बचने के लिए इस बैंक ने बॉन्ड में काफी पैसे निवेश कर दिए. तब बॉन्ड का रिटर्न अच्छा था लेकिन, लगातार इंटरेस्ट रेट्स बढ़ने की वजह से बॉन्ड की कीमतें गिरने लगीं. आम तौर पर इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर बॉन्ड की कीमतें घटती हैं और इंटरेस्ट रेट घटने पर इसकी कीमतें बढ़ती हैं.
बॉन्ड बेचने में हुआ जबर्दस्त घाटा
एसेट-लायबिलिटी का संतुलन बिगड़ने पर सिलिकॉन वैली बैंक ने अपने बॉन्ड्स (BONDS) बेचने का फैसला किया लेकिन करीब 21 अरब डॉलर के बॉन्ड बेचने से उसे 1.8 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा. 8 मार्च को यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. लॉस उठाकर बॉन्ड बेचने का मतलब यह निकाला गया कि बैंक की वित्तीय स्थिति बहुत खराब हो गई है. ये खबर जंगल में आग की तरह मार्केट में फैल गई. फिर तो इसके ब्रांच के बाहर डिपॉजिटर्स की लाइन लग गई अपने पैसे निकालने के लिए. इनवेस्टर्स ने इसके शेयरों की ताबड़तोड़ बिकवाली शुरू कर दी. इससे शेयर के भाव 60 फीसदी तक टूट गए.
सिग्नेचर बैंक भी हुआ बंद
हालात को बिगड़ता देख अमेरिका में बैंक डिपॉजिट को इंश्योरेंस सेवाएं देने वाली FIDC ने दूसरे रेगुलेटर्स से बातचीत करने के बाद सिलिकॉन वैली बैंक को बंद करने का ऐलान कर दिया. इससे ग्लोबल फाइनेंशियल सेक्टर में तहलका मच गया. 2008 में अमेरिका में वॉशिंगटन म्यूचुअल के बाद सिलिकॉन वैली बैंक जैसे किसी बड़े बैंक के बंद होने की यह पहली घटना है. लेकिन इसका साइड इफेक्ट ये हुआ कि न्यूयॉर्क का सिगनेचर बैंक भी बंद हो गया. कहा ये जा रहा है कि सिलिकॉन वैली बैंक के बंद होने के बाद शुरू हुए पैनिक की वजह से ही सिग्नेचर बैंक को बंद करना पड़ा. सिग्नेचर बैंक रियल स्टेट को लोन देने के लिए जाना जाता था और इसमें क्रिप्टोकरेंसी भी जमा की जाती थी. सिलिकॉन वैली बैंक के बंद होने के बाद अमेरिकी बैंक रेगुलेटर्स ने सलाह दी थी कि अगर सिग्नेचर बैंक को बंद नहीं किया गया तो यह पूरे फाइनेंशियल सिस्टम पर असर डाल सकता है.

स्वतंत्र पत्रकार

