आज ऑनलाइन और टेक्नोलॉजी का ज़माना है. आज के दौर में लोग घरेलु नुस्खों से ज्यादा TV पर चलने वाले विज्ञापनों पर भरोसा करते हैं. वही विज्ञापन जो बिना किसी रिसर्च के धीरे धीरे घरेलु उत्पादों को ख़त्म करते हुए केमिकल और खतरनाक रसायनों से बने प्रोडक्ट्स हमें बेचते हैं और हमें लगता है कि TV पर आ रहा है तो अच्छा ही होगा. विज्ञापन भी ऐसे जिसमें फिल्मी सितारे ही कभी डॉक्टर बन जाते हैं तो कभी साइंटिस्ट . खैर आप सोच रहे होंगे कि आज हम ये सब क्या बात कर रहे हैं तो उसके लिए हमें अपने पूर्वजों के तौर तरीके याद करने होंगे. पहले के ज़माने में हमारे दादा- नाना नमक से या फिर लकड़ी के कोयले को पीस कर दन्त मंजन किया करते थे.इतना ही नहीं नीम और बबूल की टहनी से दातुन करते थे जिससे उनके दांत हमेशा सलामत रहते थे. पहले के ज़माने में लोग घर का आंगन गोबर से लीपा करते थे जिससे बीमारियां घर में नहीं आया करती थी . पहले के ज़माने में लोग घरों में तैयार तेल और देशी घी का सेवन करते थे और मज़बूत रहते थे.
कैसे फैला विज्ञापन का मायाजाल
जब से बाजार में ब्रांडेड उत्पाद आये, TV पर विज्ञापन आने लगे तो उन्होंने सबसे पहले इन्हीं चीज़ों को बंद कराया. नमक, नीम की डंडी और राख से दांत साफ़ करना बंद कराया. वो कहते थे कि ये सब आपके दाँतों को कमज़ोर बनाते हैं लेकिन बड़ी कमाल की बात है तब ना तो कैविटी होती थी और ना ही पायरिया, ना ही दांत जल्दी टूटते थे . हाँ ये बात अलग है कि बाद में वही कंपनियां अपने विपज्ञापनों में अपने टूथ पेस्ट में नमक का सवाल पूछ पूछकर उसे वही पुराने नुस्खे के साथ महंगे दामों पर आपको बेचने लगे . कभी चारकोल तो कभी नीम के गुणों का विज्ञापन दिखाते रहे . वही नीम के दातुन जो आपके घरों के बाहर भी मिल जाएंगे लेकिन यही प्रोडक्ट आज बड़ी कंपनियां महंगे दामों पर बेच रही हैं. विज्ञापनों ने देशी घी और कोल्हू से निकले कच्चे तेल को बंद कराया और कहा ये तो कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं . हमने फिर उनकी बात मानकर सफोला , सन ड्रॉप तेल जिसमें जीरो कोलेस्ट्रॉल के साथ साथ जीरो गुण हो गये और हमारी सेहत भी गिरने लगी. हाँ वो बात अलग है कि अब वही कम्पनियां कच्ची घानी और कोल्हू का सरसों तेल भी बेच रही हैं.
ये सब बातें काफी हैं ये समझने के लिए कि हम आखें बंद कर किस तरह विज्ञापनों के जाल में फंसते चले गए . पहले ज्वार बाजरा मकई ये सब हमारे पूर्वज बड़े आराम से खाया करते थे फिर इसे जानवरों का भोजन बता दिया गया लेकिन आज मिलेट्स के नाम पर करोड़ों कमाए जा रहे हैं.
गाय के गोबर से लेकर पूजा की लकड़ी तक सब बिकाऊ
सिर्फ इतना ही नहीं ऑनलाइन शॉपिंग के ज़माने में गाय के गोबर के उपले से लेकर पूजा में इस्तेमाल होने वाली लकड़ियां तक आपको ऑनलाइन मिल जाएंगी वो भी महंगे दामों पर और अब तो हद ही हो गई है अब ऑनलाइन आपको बरतन मांजने वाली राख भी मिल जायेगी. वो भी 1800 रूपए किलो के हिसाब से. जी हाँ कभी इसी राख से हमारे पूर्वज घर के बरतन धोया करते थे लेकिन विज्ञापनों ने वो भी ख़तम करा दिया . राख के बारे में विज्ञापन में कहा गया कि ‘Its not Hygenic’ लेकिन अब यूनिवर्सिटी ऑफ़ सदन कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के मुताबिक जले हुए बर्तनों और नार्मल बर्तनों को धोने के लिए जो डिटर्जेंट सोप इस्तेमाल किया जाता है वो 4 गुना तेज़ी से कैंसर को पैदा करता है. कई बार साबुन बर्तनों पर लगा रह जाता है वो आपकी सेहत को बहुत ज्यादा नुकसान पहुँचा सकता है . इस बात को समझाते हुए भारतीय योग गुरु बाबा राम देव ने ट्वीट कर कहा जिस चूल्हे की राख से हमारे पूर्वज बर्तन मांजते थे, पहले उनको अवैज्ञानिक कहकर उसका मजाक बनाया गया. केमिकल वाले डिशवाश के प्रयोग की आदत डाली गई जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बना. आज वही चूल्हे की राख अमेज़न जैसी कंपनी 1800 रुपये किलो बेच रही है.
तो देखा आपने वो कहावत तो आज सच हो गई कि वक्त अपने आप को दोहराता जरूर है. जिन पूर्वजों की सीख को मोडर्नाइज़ेशन के नाम पर त्यागा गया था आज वही हमारे सामने आ खड़ी हुई है. बस नए अन्दाज में नए पैकेजिंग में और महंगे दामों में. जब वो हमारे घर में थी तब उनकी कदर नहीं थी और आज क्या हाल है ये आप देख ही रहे हैं.

