वाशिंगटन। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का भविष्य केवल कोडिंग या एल्गोरिदम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अत्याधुनिक सिलिकॉन चिप्स और भारी-भरकम बिजली पर निर्भर एक भौतिक बुनियादी ढांचा है। वैश्विक शक्ति संतुलन की इस दौड़ में अमेरिका चिप्स के मोर्चे पर सबसे आगे है, जबकि चीन घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। इसके मुकाबले यूरोप इस तकनीक में पीछे चल रहा है, और भारत वैश्विक कंप्यूट शेयर का केवल 1.6 प्रतिशत हिस्सा रखते हुए अभी शुरुआती दौर में है।
चिप निर्माण और वैश्विक कंप्यूटिंग में अमेरिका का वर्चस्व
एपोक एआई के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर एआई कंप्यूटिंग क्षमता का करीब 72 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका के पास है। अनुमान है कि वर्ष 2026 की पहली छमाही तक जोड़ी जाने वाली नई एआई कंप्यूटिंग क्षमता का 78 प्रतिशत भी अमेरिकी हिस्से में जाएगा। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चीन को एनवीडिया जैसे अत्याधुनिक चिप्स मिलने बंद हो गए हैं, जिससे वह घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है। हालांकि, तकनीकी दक्षता के मामले में वह अभी अमेरिका से काफी पीछे है। वहीं, वैश्विक सेमीकंडक्टर उत्पादन में यूरोप की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम है, जबकि भारत में टाटा का गुजरात प्लांट और एचसीएल-फॉक्सकॉन की नोएडा यूनिट अभी शुरुआती चरण में हैं और इनमें देरी भी देखने को मिल रही है।
ऊर्जा की भारी खपत और डेटा सेंटरों की चुनौतियां
एआई डेटा सेंटर बिजली के अत्यधिक बड़े उपभोक्ता हैं। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, दुनिया भर में डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2024 के 415 टेरावाट-घंटे (TWh) से बढ़कर 2030 तक लगभग 945 TWh हो जाएगी। इस कुल वृद्धि का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिका और चीन का होगा। अमेरिका में 240 TWh और चीन में 175 TWh की अतिरिक्त बिजली की मांग बढ़ेगी। भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2025 के 1.5 गीगावाट से बढ़कर 2030 तक 10 गीगावाट तक पहुंच सकती है, जिससे भारत में बिजली की मांग करीब 57 TWh तक होने का अनुमान है।
भारत के सामने बुनियादी संसाधनों की बड़ी बाधा
भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी आईटी प्रतिभा है, लेकिन सरकारी आर्थिक समीक्षा के अनुसार बिजली, पानी और वित्त जैसे बुनियादी संसाधन एआई के तीव्र विस्तार में बड़ी रुकावट बन सकते हैं। हालांकि, गूगल, अमेज़न और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों ने भारत में एआई और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 67.5 अरब डॉलर से अधिक के निवेश का ऐलान किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने स्वदेशी सेमीकंडक्टर और पर्याप्त ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की, तो वह अपनी खुद की एआई ताकत विकसित करने के बजाय केवल विदेशी एआई सिस्टमों को होस्ट करने वाला देश बनकर रह जाएगा।

