यरूशलम। इजराइल में आगामी आम चुनावों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति में गिरावट देखी जा रही है, जिससे उनकी सरकार वापसी की संभावनाओं पर सवाल उठने लगे हैं। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाला विपक्षी दल 'यशार' चुनाव में सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरता दिख रहा है।
सर्वेक्षण के नए आंकड़े और लिकुड पार्टी की चुनौती
हालिया ओपिनियन पोल के नतीजों से संकेत मिलता है कि 'यशार' पार्टी 25 सीटें जीतकर शीर्ष स्थान हासिल कर सकती है। इसके विपरीत, सत्ताधारी 'लिकुड पार्टी' 21 सीटों पर सिमटती नजर आ रही है। बीते कुछ हफ्तों के दौरान आए सर्वेक्षणों में दोनों दलों के बीच नजदीकी मुकाबला देखा गया था, लेकिन नए आंकड़ों ने 'यशार' को 4 सीटों की स्पष्ट बढ़त दिला दी है।
नेसेट का गणित और बहुमत का संकट
इजराइली संसद (नेसेट) की कुल 120 सीटों में से सरकार का गठन करने के लिए किसी भी गठबंधन को न्यूनतम 61 सीटों के जादुई आंकड़े की आवश्यकता होती है। सर्वे के मुताबिक, नेतन्याहू विरोधी 'चेंज ब्लॉक' को 58 सीटें मिलने का अनुमान है, जो बहुमत से महज 3 सीटें पीछे है। वहीं, नेतन्याहू के समर्थक गुट के खाते में 50 सीटें जाने का अनुमान लगाया गया है, जबकि अरब राजनीतिक समूहों को 12 सीटें मिल सकती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा दल बनने के बाद भी 'यशार' के लिए गठबंधन बनाना आसान नहीं होगा।
विपक्षी खेमे में पीएम पद की होड़
आइजेनकोट के बेहतर प्रदर्शन के बाद विपक्षी मोर्चे के भीतर भावी प्रधानमंत्री के चेहरे को लेकर मंथन जारी है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाली 'बीयाचद' पार्टी के नेता याइर लैपिड ने स्पष्ट किया है कि वे वैकल्पिक सरकार के रास्ते में रुकावट नहीं बनेंगे। हालांकि, उन्होंने आइजेनकोट की दावेदारी पर खुलकर समर्थन व्यक्त नहीं किया है। दूसरी तरफ, गादी आइजेनकोट की राय है कि विपक्षी खेमे में सर्वाधिक सीटें लाने वाले दल के प्रमुख को ही नेतृत्व का प्रथम अवसर मिलना चाहिए।
इजराइल की निर्वाचन प्रणाली और सरकार गठन
इजराइल की चुनावी प्रक्रिया अन्य देशों से भिन्न है, जहाँ आम जनता सीधे प्रधानमंत्री का चयन नहीं करती। संपूर्ण देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहाँ नागरिक राजनीतिक दलों की सूचियों के लिए मतदान करते हैं। डाले गए मतों के अनुपात में संसद की 120 सीटें विभाजित की जाती हैं। इसके बाद विभिन्न दल मिलकर बहुमत साबित करने की कोशिश करते हैं। जो नेता 61 सांसदों का समर्थन प्राप्त कर लेता है, वही प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करता है।

