देहरादून : उत्तराखंड में चुनाव अभी आठ-नौ महीने दूर हैं, लेकिन लड़ाई शुरू हो चुकी है। एक तरफ भाजपा की पूरी चुनावी मशीनरी मैदान में उतर रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन देहरादून पहुंच रहे हैं, विधायकों की रिपोर्ट देखी जा रही है, संगठन को एक्टिव किया जा रहा है और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। दूसरी तरफ राहुल गांधी उत्तराखंड आ रहे हैं। पौड़ी में पूर्व सैनिक सम्मेलन करेंगे, अग्निपथ योजना पर सवाल उठाएंगे, वन रैंक वन पेंशन की बात करेंगे और युवाओं को साधने की कोशिश करेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर दोनों दलों को इतनी जल्दी चुनावी मोड में आने की जरूरत क्यों पड़ गई? क्या भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का डर सता रहा है? या फिर कांग्रेस को लग रहा है कि 2027 उसके लिए आखिरी बड़ा मौका है? अगर इस बार चूक गये तो उत्तराखंड से सफाया हो जाएगा.
तीसरी बार जीतना चाहती है BJP
उत्तराखंड में ये ट्रेंड रहा है कि कोई राजनीतिक पार्टी दूसरी बार लौटकर नहीं आती है लेकिन 2022 में भाजपा ने इतिहास रचा था और इस मिथक को तोड़ दिया था। उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार कोई पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटी थी लेकिन 2027 का चुनाव भाजपा के लिए उससे भी बड़ी चुनौती है। क्योंकि अब जनता सरकार के दस साल का हिसाब मांगेगी। बेरोजगारी पर सवाल होंगे। पेपर लीक पर सवाल होंगे। पलायन पर सवाल होंगे। स्थानीय युवाओं के रोजगार पर सवाल होंगे। और यही वजह है कि भाजपा अभी से सीट-दर-सीट समीक्षा में जुट गई है। नितिन नवीन का दौरा इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी जानती है कि केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। जमीनी स्तर पर किया गया काम, जनता का सहयोग और समर्थन और विधायकों का रिपोर्ट कार्ड भी मायने रखेगा।
Rahul Gandhi भी कर रहे हैं तैयारी
जहां तक कांग्रेस पार्टी की बात है तो कांग्रेस की पूरी रणनीति इस बार दो वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है— पहला, युवा। दूसरा, पूर्व सैनिक।
उत्तराखंड में लाखों परिवार सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से सेना से जुड़े हुए हैं। ऐसे में राहुल गांधी का पूर्व सैनिक सम्मेलन कोई सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है। कांग्रेस अग्निपथ योजना को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। वह यह संदेश देना चाहती है कि चार साल की सैन्य सेवा वाला मॉडल युवाओं और सेना दोनों के हित में नहीं है। साथ ही वन रैंक वन पेंशन और पूर्व सैनिकों के अन्य मुद्दों को भी उछाला जाएगा। लेकिन यहां कांग्रेस के सामने भी एक बड़ी चुनौती है। क्या केवल अग्निपथ का मुद्दा चुनाव जिता सकता है? क्या राहुल गांधी की सभाएं वोटों में बदल पाएंगी? और सबसे अहम सवाल… क्या कांग्रेस के पास मुख्यमंत्री पद का कोई ऐसा चेहरा है जो भाजपा को सीधी चुनौती दे सके?
बीजेपी-कांग्रेस के पास क्या हैं मुद्दे
यही वह प्वाइंट है जहां भाजपा अभी भी मजबूत दिखाई देती है।
अब जरा उत्तराखंड के चुनावी गणित को ध्यान से समझिए। भाजपा का सबसे बड़ा हथियार क्या है? डबल इंजन सरकार। चारधाम ऑल वेदर रोड। रेल और सड़क परियोजनाएं। धार्मिक पर्यटन। केंद्र और राज्य सरकार का समन्वय।
वहीं बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के पास हथियार क्या है? महंगाई। बेरोजगारी। अग्निपथ योजना। पलायन। और स्थानीय असंतोष।
यानि लड़ाई साफ है। एक तरफ विकास का दावा। दूसरी तरफ जनता के मुद्दों का सवाल लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में एक और फैक्टर हमेशा काम करता है—सत्ता विरोधी रुझान। राज्य का इतिहास बताता है कि जनता अक्सर सरकारें बदलती रही है। हालांकि 2022 में भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ा था और लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की थी. अब देखना यह है कि क्या भाजपा एक नया इतिहास रचकर लगातार तीसरी बार सत्ता में आएगी? या कांग्रेस यह साबित करेगी कि उत्तराखंड में बदलाव की राजनीति अभी खत्म नहीं हुई है?
Rahul Gandhi के दौरे से चुनावी माहौल गर्माया
फिलहाल इतना तय है कि राहुल गांधी के दौरे और भाजपा की रणनीतिक बैठकों ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है। असली लड़ाई अब सड़कों, सभाओं और जनता के बीच लड़ी जाएगी। और शायद 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगा। यह चुनाव विकास बनाम बेरोजगारी, राष्ट्रवाद बनाम स्थानीय मुद्दे, और संगठन बनाम असंतोष की लड़ाई भी होगा।

