15 साल के वैभव सूर्यवंशी की भावुक सफलता की कहानी

बिहार के समस्तीपुर जिले का छोटा सा कस्बा ताजपुर, जहां आज भी जिंदगी की रफ्तार चाय के कपों में मापी जाती है, अब भारतीय क्रिकेट के नक्शे पर उभरता हुआ नाम बन चुका है। कभी शांत और साधारण रहा यह इलाका अब एक नई पहचान से जाना जाता है- वैभव सूर्यवंशी का घर। पेड़ों से घिरी सड़कों, खेतों और छोटे-छोटे घरों के बीच पला-बढ़ा यह लड़का आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है। मंगलवार को जब वैभव ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज जसप्रीत बुमराह के एक ओवर में दो छक्के लगाए तो सब हैरान रह गए। वैभव को हमेशा से स्पेशल टैलेंट कहा जाता रहा है, लेकिन मंगलवार को उन्होंने इसे साबित भी किया। इस आईपीएल में वैभव को लेकर जो क्रेज है, शायद ही वैसा क्रेज किसी और को खेलते देखने के लिए है। 

पिता का अधूरा सपना, बेटे ने किया पूरा

वैभव सूर्यवंशी की कहानी उनके पिता संजीव सूर्यवंशी के बिना अधूरी है। संजीव खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन उस दौर में बिहार को बीसीसीआई से मान्यता नहीं मिलने के कारण उनका सपना अधूरा रह गया। संजीव ने अपने संघर्ष के दिनों में मुंबई का रुख किया। वहां उन्होंने शिपिंग यार्ड में काम किया, पोर्ट पर मेहनत की और कभी-कभी नाइट क्लब में बाउंसर तक बने।

उनके एक करीबी राजेश झा ने क्रिकेट मंथली को बताया, 'वैभव के पिता को एक्टिंग का भी शौक था, लेकिन जिंदगी चलाने के लिए उन्हें कई तरह के काम करने पड़े।' करीब एक दशक तक संघर्ष करने के बाद संजीव वापस ताजपुर लौट आए और पारिवारिक ज्वेलरी की दुकान संभालने लगे, लेकिन क्रिकेट के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

100 किलोमीटर साइकिल और जुनून की मिसाल

संजीव के क्रिकेट प्रेम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने किशोर दिनों में हर साल 100 किलोमीटर साइकिल चलाकर पटना जाते थे, सिर्फ एक टूर्नामेंट का फॉर्म लेने के लिए। यही जुनून उन्होंने अपने बेटे में भी उतारा।

चार साल की उम्र में हाथ में थमा बल्ला

वैभव को उनके चौथे जन्मदिन पर पहली बार बैट दिया गया। तभी से उनके खेल में कुछ अलग नजर आने लगा था। 2018 के आसपास जब उनकी प्रतिभा खुलकर सामने आई, तो संजीव ने फिर से वही संघर्ष शुरू किया, लेकिन इस बार बेटे के लिए।

200 किलोमीटर का रोजाना सफर: पिता का त्याग

संजीव ने एक सेकंड-हैंड एसयूवी खरीदी और हर दूसरे दिन ताजपुर से पटना के बीच 200 किलोमीटर का सफर तय करना शुरू किया। पटना के संपतचक में स्थित जेन नेक्स्ट क्रिकेट अकादमी में वैभव को ट्रेनिंग दिलाई जाती थी, जहां कोच मनीष कुमार ओझा उन्हें ट्रेनिंग देते थे। यह सफर आसान नहीं था। तीन घंटे का एकतरफा रास्ता, सुबह चार बजे उठना और देर रात घर लौटना, यही दिनचर्या बन चुकी थी। कोच ओझा ने क्रिकेट मंथली को बताया, 'हर दिन सुबह चार बजे उठकर 100 किलोमीटर आना, ट्रेनिंग करना और फिर लौटना, यह आसान नहीं था। लेकिन वैभव और उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी।'

600 गेंद रोज, सिर्फ अटैक पर फोकस

वैभव की ट्रेनिंग भी उतनी ही कठोर थी। ओझा बताते हैं, 'मैं आमतौर पर बच्चों को 200-250 गेंदें खिलाता हूं, लेकिन वैभव के लिए कोई गिनती नहीं थी। वह कम से कम 600 गेंद रोज खेलता था।' सबसे खास बात यह थी कि वैभव को डिफेंस नहीं, बल्कि अटैक सिखाया गया। हर गेंद पर नए शॉट्स और नए विकल्प विकसित करने पर ध्यान दिया गया।

समस्तीपुर का मैदान और पहली पहचान

वैभव ने अपने शुरुआती साल समस्तीपुर के एक बड़े मैदान में बिताए, जहां सैकड़ों बच्चे अलग-अलग खेल खेलते थे। उनके पहले कोच ब्रजेश झा बताते हैं, 'जब वह सिर्फ नौ साल का था, तब भी उसका खेल 14-15 साल के लड़के जैसा परिपक्व था।' कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी खास अनुमति लेकर उसकी ट्रेनिंग जारी रखी गई।

अनुकूल रॉय से प्रेरणा, वैभव से क्रांति

समस्तीपुर पहले भी अनुकूल रॉय जैसे खिलाड़ी दे चुका था, लेकिन वैभव के आने के बाद यहां क्रिकेट का क्रेज कई गुना बढ़ गया। आज इस मैदान पर चार से सात साल के करीब 60 बच्चे नियमित ट्रेनिंग लेते हैं। कोच झा कहते हैं, 'अब इतने बच्चे आ रहे हैं कि सबको वैसा ध्यान देना मुश्किल हो गया है जैसा हम वैभव को दे पाते थे।'

अब ताजपुर बना 'क्रिकेट का पता'

आज अगर आप पटना से समस्तीपुर की ओर जाते हैं, तो ताजपुर का नाम अब सिर्फ एक कस्बा नहीं, बल्कि एक पहचान बन चुका है। आईपीएल 2025 के बाद यहां अक्सर टीवी कैमरे नजर आते हैं और लोग सिर्फ एक ही जगह के बारे में पूछते हैं- वैभव सूर्यवंशी का घर किधर है?

13 साल की उम्र में करोड़ों की चर्चा क्यों?

जब कोई फ्रेंचाइजी 13 साल के खिलाड़ी के लिए 10 करोड़ रुपये अलग रखने की बात करती है, तो यह सिर्फ प्रतिभा की नहीं, बल्कि उस भरोसे की कहानी है जो वर्षों की मेहनत और त्याग से बना है। वैभव सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की मिसाल हैं जहां छोटे शहरों से निकलकर भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं।

एक परिवार, एक सपना, एक सितारा

वैभव सूर्यवंशी की कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, बल्कि एक पिता के अधूरे सपने, एक परिवार के त्याग और एक बच्चे की मेहनत की कहानी है। ताजपुर की गलियों से लेकर आईपीएल के मंच तक का यह सफर यह साबित करता है कि अगर जुनून सच्चा हो, तो दूरी, संसाधन और हालात, कुछ भी रास्ता नहीं रोक सकते। और शायद यही वजह है कि आज पूरा देश वैभव सूर्यवंशी का नाम याद रख रहा है।

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