पंजाब चुनाव से पहले हवारा पर AAP का दांव? पैरोल को लेकर बदली सरकार की राय

चंडीगढ़ | पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक दलों की सरगर्मी तेज हो गई है। चुनावों को लेकर सभी दल अपनी-अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं। इसी बीच, जेल में बंद सिख उग्रवादियों की पैरोल का संवेदनशील मुद्दा एक बार फिर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। पंथिक वोट बैंक को अपने पाले में खींचने के लिए आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक बड़ा सियासी दांव चला है। दरअसल, 'आप' सरकार द्वारा सिख उग्रवादी जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मामले में अपना रुख बदले जाने के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल काफी तेज हो गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी चुनाव में सिख समुदाय के मतदान के रुख को तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। उल्लेखनीय है कि जगतार सिंह हवारा को वर्ष 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी करार दिया गया था और वह फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में सजा काट रहा है।

हवारा की पैरोल पर मान सरकार का बदला रुख

कुछ समय पूर्व जगतार सिंह हवारा के परिवार और समर्थकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात की थी। इस प्रतिनिधिमंडल ने हवारा के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग को आगे बढ़ाने के वास्ते सहयोग के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस सिलसिले में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखने के साथ-साथ उनसे मुलाकात भी की थी।

इस प्रतिनिधिमंडल में हवारा की चचेरी बहन पुष्पिंदर कौर और वर्ष 1998 के बुड़ैल जेल षड्यंत्र मामले के सह-आरोपी रहे जसवंत सिंह शामिल थे। उल्लेखनीय है कि बुड़ैल जेल मामले में जसवंत सिंह को साल 2003 में अदालत द्वारा बरी कर दिया गया था। इस पूरे घटनाक्रम में सिख उपदेशक बलदेव सिंह वडाला ने हवारा के परिवार और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि इस मामले को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह विशुद्ध रूप से एक मानवीय मामला है, क्योंकि हवारा की मां की तबीयत बेहद खराब है और इसी आधार पर परिवार ने पैरोल की गुहार लगाई है। वडाला के मुताबिक, इससे पूर्व भी कई अन्य सिख बंदियों को पैरोल मिल चुकी है और वे समयानुसार बिना किसी अप्रिय घटना के वापस जेल लौट आए हैं। वहीं, हवारा के परिवार ने भी प्रशासन को यह भरोसा दिलाया है कि वे रिहाई या पैरोल के दौरान सुरक्षा से जुड़े सभी नियमों और शर्तों का पूरी तरह पालन करेंगे।

भ्योरा और तारा की पैरोल पर भी टिकी हैं नजरें

हवारा के अलावा बेअंत सिंह हत्याकांड में ही सजा काट रहे अन्य दोषियों—परमजीत सिंह भ्योरा और जगतार सिंह तारा की पैरोल को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हैं। जसवंत सिंह के दावों के अनुसार, सरकार इन दोनों की पैरोल अर्जियों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। उनका यह भी कहना है कि भ्योरा की फाइल फिलहाल पटियाला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के पास विचाराधीन है, और माना जा रहा है कि हवारा के मामले में अंतिम निर्णय आने के बाद भ्योरा तथा तारा से जुड़ी फाइलों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।

अकाली दल का पुराना रुख और राजनीतिक अंतर्विरोध

सिख कैदियों और उग्रवादियों के मुद्दों पर पंजाब के अन्य राजनीतिक दलों का रुख हमेशा से विरोधाभासी रहा है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) का रवैया भी इस मामले में मिला-जुला रहा है। नवंबर 2015 में जब कुछ अकाली दल-विरोधी सिख संगठनों द्वारा 'सरबत खालसा' का आयोजन किया गया था, तब उसमें जगतार सिंह हवारा को अकाल तख्त का जत्थेदार नियुक्त किया गया था। उस वक्त तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और वर्तमान SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने हवारा को कड़े शब्दों में 'आतंकवादी' करार दिया था।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जब पंथिक वोटों पर अकालियों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी थी, तब आम आदमी पार्टी ने इस खाली स्पेस को भरने की कोशिश शुरू की थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने वर्ष 1993 के दिल्ली बम ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराए गए देविंदर पाल सिंह भुल्लर की मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, बाद में वर्ष 2020 और फिर 2024 में दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) ने भुल्लर की समय से पहले रिहाई की मांग को कई बार खारिज कर दिया। इस पर अकाली दल ने 'आप' सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी अंदरखाने भुल्लर की रिहाई का विरोध कर रही है। इसके विपरीत, वर्ष 2009 में जब SAD के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार थी, तब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में भुल्लर को “खूंखार और अनुभवी अपराधी” बताया गया था। बाद के वर्षों में अकाली नेताओं ने 'आप' पर इन कैदियों को जेल में रखने की साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया।

पंथिक राजनीति के नए समीकरण और दावेदार

पंजाब की मौजूदा चुनावी बिसात पर पंथिक वोटों का समीकरण अतीत की तुलना में कहीं अधिक जटिल और बहुकोणीय हो गया है। हाल के दिनों में 'वारिस पंजाब दे' जैसे संगठनों ने पंथिक राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों के परिवारों को भी चुनावी मैदान या राजनीतिक मंच प्रदान किया है। इस संगठन ने सतवंत सिंह (इंदिरा गांधी के हत्यारों में से एक) के बेटे को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अपना पहला उम्मीदवार घोषित किया है। इसके अलावा, फरीदकोट से सांसद सरबजीत सिंह खालसा भी बेअंत सिंह के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। 'वारिस पंजाब दे' के संसदीय बोर्ड के सदस्य सुखविंदर सिंह अघवां रिश्ते में सतवंत सिंह के भतीजे लगते हैं। इन तमाम घटनाक्रमों के बीच जेल में बंद उग्रवादियों की पैरोल और रिहाई का यह मुद्दा आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति को और अधिक गरमाने के पूरे आसार हैं।

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