चंडीगढ़: पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने कुख्यात गैंगस्टर गोल्डी बराड़ के इशारे पर न्यायालय परिसर के भीतर एक सनसनीखेज हत्याकांड को अंजाम देने की साजिश रचने के मुख्य आरोपी की जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे देश की न्याय व्यवस्था और स्थापित कानून के शासन पर एक सीधा और सीधा प्रहार करार दिया है। गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के कड़े प्रावधानों के तहत सुनाए गए इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक परिसरों की सुरक्षा और गरिमा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
न्यायिक परिसर की सुरक्षा और समाज में खौफ का माहौल
उच्च न्यायालय ने अपने कड़े रुख में स्पष्ट किया कि अदालत परिसर जैसी अति-सुरक्षित और पवित्र जगह पर किसी की हत्या की साजिश रचना महज किसी एक व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं माना जा सकता, बल्कि यह देश की पूरी न्यायिक प्रणाली को दी गई एक खुली चुनौती है। ऐसी साजिशें और घटनाएं समाज के आम नागरिकों के मन में गहरा खौफ और आतंक का माहौल पैदा करती हैं, जिसके कारण प्रथम दृष्टया ऐसे संवेदनशील मामलों को किसी भी स्तर पर हल्के में नहीं लिया जा सकता। हालांकि, आरोपी के कानूनी प्रतिनिधि ने यह तर्क देने का प्रयास किया था कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है, आरोपपत्र (चार्जशीट) भी अदालत में दाखिल की जा चुकी है और वह लंबे समय से जेल की सलाखों के पीछे है, इसलिए उसे जमानत का लाभ मिलना चाहिए।
अभियोजन पक्ष की दलीलें और गवाहों की सुरक्षा का संकट
दूसरी तरफ, राज्य सरकार और अभियोजन पक्ष ने आरोपी की जमानत अर्जी का पुरजोर विरोध करते हुए अदालत के समक्ष कई पुख्ता सबूत पेश किए। सरकारी वकील ने दलील दी कि आरोपी एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संगठित आपराधिक और आतंकी सिंडिकेट का बेहद सक्रिय हिस्सा है, जिसके सीधे तार गैंगस्टर गोल्डी बराड़ के नेटवर्क से जुड़े होने के डिजिटल व दस्तावेजी साक्ष्य मिले हैं। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट के सामने यह आशंका भी मजबूती से उठाई कि यदि इस चरण पर आरोपी को जेल से रिहा किया जाता है, तो वह बाहर आकर मामले से जुड़े महत्वपूर्ण गवाहों को डरा-धमका सकता है या सबूतों के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ कर सकता है।
कड़े कानूनी प्रावधान और जमानत खारिज करने के मुख्य आधार
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की जिरह सुनने के बाद केस डायरी और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तमाम सामग्रियों का गहनता से अवलोकन किया। अदालत ने अपने आदेश में यूएपीए (UAPA) की धारा 43-डी(5) का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इस अधिनियम के तहत किसी भी आरोपी को जमानत देने से पहले अदालत को यह पूर्ण संतुष्टि होनी चाहिए कि उस पर लगे आरोप पहली नजर में पूरी तरह बेबुनियाद या गलत हैं, जबकि इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि इस मोड़ पर आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है और सभी साक्ष्यों का अंतिम व विस्तृत परीक्षण निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) की सुनवाई के दौरान ही मुकम्मल किया जाएगा।
न्यायिक संस्थाओं की साख और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संतुलन
अपने विस्तृत फैसले के अंतिम भाग में हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि न्यायालय परिसरों में इस प्रकार की हिंसक और आत्मघाती साजिशें न्याय प्रणाली में आम जनता के अटूट विश्वास को कमजोर करती हैं। यदि इस तरह की जघन्य वारदातों की योजना बनाने वाले अपराधियों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी या सहानुभूति बरती जाएगी, तो इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होंगे और कानून के शासन पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अदालत ने कहा कि ऐसे राष्ट्रविरोधी और समाजविरोधी मामलों में किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तुलना में पूरे समाज की सामूहिक सुरक्षा और देश की न्यायिक साख को सर्वोपरि रखकर संतुलन बनाना बेहद अनिवार्य हो जाता है।

