अयोध्या। भव्य राम मंदिर में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाए गए सोने-चांदी और नकदी के कथित गबन का मामला इन दिनों पूरे देश में गरमाया हुआ है। इस गंभीर प्रकरण में मंदिर की व्यवस्था और चल-अचल संपत्ति की सुरक्षा देखने वाले श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं, जबकि चढ़ावे की गिनती करने वाले कर्मचारियों से लगातार पूछताछ की जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) मामले की हर परत को खंगालने में जुटा है। इस बड़े विवाद के बीच, श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने दान व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध तिरुमला तिरुपति मंदिर के प्रशासनिक स्वरूप को अयोध्या में भी लागू करने का अहम सुझाव दिया है। उनका मानना है कि तिरुपति देवस्थानम की तर्ज पर यहाँ भी एक कमिश्नर रैंक के आईएएस अधिकारी को मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त किया जाना चाहिए, जिसे उत्तर प्रदेश में काम करने का लंबा अनुभव हो।
तिरुपति मंदिर का समृद्ध इतिहास और उसका मजबूत प्रशासनिक ढांचा
आंध्र प्रदेश की शेषाचलम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसे तिरुमला तिरुपति मंदिर का प्रबंधन कोई निजी संस्था नहीं बल्कि राज्य सरकार का एक वैधानिक निकाय (टीटीडी) करता है। ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर हिंदू राजाओं, मुस्लिम शासकों और फिर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन रहा। अंग्रेजी हुकूमत ने 1843 में इसका जिम्मा हाथीरामजी मठ को सौंप दिया था। करीब एक सदी बाद 1933 में मद्रास विधानमंडल ने एक विशेष कानून बनाकर टीटीडी समिति का गठन किया। इसके बाद साल 1979 और 1987 में इसे और मजबूत कानूनी अधिकार दिए गए। वर्तमान में इस व्यवस्था के दो मुख्य हिस्से हैं; पहला 'ट्रस्ट बोर्ड' जो मंदिर से जुड़ी बड़ी नीतियां तय करता है और इसके वर्तमान अध्यक्ष बीआर नायडू हैं। दूसरा हिस्सा 'दैनिक प्रशासन' का है जिसे एक सेवारत आईएएस अधिकारी संभालता है, जिन्हें एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (EO) कहा जाता है। फरवरी 2026 से इस पद पर आईएएस मुड्डादा रविचंद्र कार्यरत हैं, जो अतिरिक्त कार्यकारी अधिकारी सीएच वेंकैया चौधरी के साथ मिलकर करीब 14,000 कर्मचारियों की मदद से प्रतिदिन आने वाले 80 हजार से एक लाख तीर्थयात्रियों की व्यवस्था देखते हैं।
चढ़ावे का हिसाब और डिजिटल दान में पारदर्शिता का अनोखा रिकॉर्ड
दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में शुमार तिरुपति में दान की निगरानी के लिए एक अचूक और आधुनिक व्यवस्था लागू है। यहाँ की दानपेटियों (हुंडी) में रोजाना करीब 3.6 करोड़ से 4.1 करोड़ रुपये की नकदी आती है, जो सालाना 1,600 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। इसके अलावा प्रतिवर्ष लगभग 1,400 किलोग्राम सोना भी चढ़ावे में आता है। अक्टूबर 2025 तक के वित्तीय विवरण के अनुसार, इस देवस्थानम के पास बैंकों में 14,000 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट और करीब 20 टन सोना जमा है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहाँ आने वाले गुप्त दान की गिनती अगले ही दिन करके उसे जनता के सामने सार्वजनिक कर दिया जाता है। इसके अलावा, पूरे परिसर में डिजिटल कियोस्क लगाने का यह परिणाम रहा कि वर्ष 2025 में मंदिर के इतिहास में पहली बार ऑनलाइन माध्यम से मिलने वाला दान नकद चढ़ावे से आगे निकल गया। अकेले 11 महीनों में भक्तों ने विभिन्न सामाजिक कार्यों जैसे मुफ्त भोजन (अन्नप्रसादम ट्रस्ट), चिकित्सा, गो-रक्षा और शिक्षा से जुड़े ट्रस्टों में 918.6 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड दान दिया।
तिरुपति मॉडल की सीमाएं और राम मंदिर के लिए इसकी उपयोगिता
यूं तो तिरुपति की यह व्यवस्था बेहद पेशेवर मानी जाती है, लेकिन यह पूरी तरह से दोषमुक्त भी नहीं है। नियमानुसार यहाँ के प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल पांच से सात साल का होना चाहिए, मगर अक्सर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण अधिकारियों का समय से पहले तबादला कर दिया जाता है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में टीटीडी में एक साल के भीतर तीन कार्यकारी अधिकारी बदले गए। इसके अतिरिक्त, पिछले दिनों हुए 'लड्डू प्रसादम विवाद' (घी मिलावट प्रकरण) के दौरान भी राजनीतिक दबाव के चलते अधिकारियों को बीच भंवर में ही हटा दिया गया था। इन तमाम व्यावहारिक कमियों के बावजूद नृपेंद्र मिश्र और अन्य विशेषज्ञ इस मॉडल की वकालत इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि यह नीतियां बनाने वाले बोर्ड और उसे जमीन पर उतारने वाले पेशेवर प्रशासनिक अधिकारी के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन करता है। अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के वर्तमान स्वरूप में इसी जवाबदेही और कार्यविभाजन की कमी खल रही है, जिसे दूर करना अब अनिवार्य हो चुका है।

