जान से मारने की धमकी के बाद बढ़ाई गई विक्रम की सुरक्षा, दुकान पर पहुंचे CRPF जवान

कृष्णानगर | लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने हाथों से तैयार 'झालमुड़ी' (मुरमुरे का एक बंगाली स्नैक) खिलाकर चर्चा में आए दुकानदार विक्रम शॉ को लेकर एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। शनिवार को विक्रम शॉ ने दावा किया कि पीएम को झालमुड़ी परोसने के बाद से उन्हें लगातार जान से मारने और बम से उड़ाने की धमकियां दी जा रही हैं। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित ने स्थानीय पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई है, जिसके बाद उनकी सुरक्षा के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों को तैनात कर दिया गया है।

धमकी भरे फोन और व्हाट्सऐप मैसेज मिलने का दावा

मीडिया से बातचीत करते हुए विक्रम शॉ ने बताया कि उन्हें किसी अज्ञात व्यक्ति का धमकी भरा फोन कॉल आया था, जिससे वह और उनका परिवार बेहद डरे हुए हैं। इसके अलावा, उन्हें व्हाट्सऐप के जरिए भी कई डराने-धमकाने वाले संदेश भेजे गए थे। यह पूरा विवाद उस घटना के बाद शुरू हुआ, जब अप्रैल महीने में कृष्णानगर में आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी जनसभा के दौरान विक्रम ने पीएम को अपने स्टॉल की झालमुड़ी का स्वाद चखाया था। शॉ ने कहा कि उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी पुलिस थाने को दे दी है और प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।

दिलीप घोष का पलटवार, कहा- हर हरकत का दिया जाएगा करारा जवाब

इस संवेदनशील मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने विरोधियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि कुछ असामाजिक तत्व इस तरह की कायराना हरकतों के जरिए राज्य और देश में सांप्रदायिक व राजनीतिक तनाव पैदा करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, "अब वह पुराना समय चला गया है। केंद्र में हमारी सरकार है और ऐसी हर देशविरोधी हरकत का जवाब बेहद कड़े और अच्छे तरीके से दिया जाएगा।"

ममता बनर्जी की बैठक और 'बुलडोजर कल्चर' पर साधा निशाना

इसके साथ ही दिलीप घोष ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा अपनी पार्टी के विधायकों के साथ 'बुलडोजर संस्कृति' के खिलाफ बुलाई गई आपात बैठक को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार को जनता की याद बहुत देर से आई है। घोष ने आरोप लगाया कि पहले मुख्यमंत्री को यह तक भनक नहीं होती थी कि पूरे बंगाल में क्या चल रहा है। अगर ऐसी समीक्षा बैठकें बहुत पहले कर ली गई होतीं और जमीन पर आम जनता की पीड़ा को समय रहते समझा गया होता, तो आज राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति कुछ और ही होती।

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