नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा की ओर से दायर उस जनहित याचिका का निपटारा कर दिया है, जिसमें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को वैकल्पिक निवेश फंड (AIF) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के वास्तविक लाभार्थियों (बेनिफिशियल ओनर्स) की पूरी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति डी.के. उपाध्याय की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी विद्यमान कानूनी या नियामकीय व्यवस्था के अभाव में अदालत ऐसा परमादेश (Mandamus) जारी नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका के औचित्य पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने महुआ मोइत्रा द्वारा सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि वे एक सांसद हैं और इस मुद्दे को संसद में उठाकर चर्चा की मांग कर सकती थीं। अदालत ने कहा कि यदि कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद होता और सेबी उसका उल्लंघन कर रहा होता, तो कोर्ट अनुपालन का आदेश जारी कर सकती थी। किंतु बिना किसी विधायी ढांचे के अदालत नया नियम लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती।
प्रशांत भूषण की दलीलें और हिंडनबर्ग मामले का उल्लेख
महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि FPI और AIF के माध्यम से शेयरों की कीमतों में हेरफेर कर आम निवेशकों को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने अदाणी-हिंडनबर्ग मामले में गठित विशेषज्ञ समिति की टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि 2018 में लाभार्थी मालिकों की अनिवार्य जानकारी देने का नियम हटाए जाने से नियामकीय तंत्र कमजोर हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि निवेशकों को यह पता हो कि शेयर की कीमतें बढ़ाने वाले FPI स्वयं कंपनी के प्रवर्तकों से जुड़े हैं, तो वे नुकसान से बच सकते हैं।
सॉलिसिटर जनरल का जवाब
केंद्र सरकार और सेबी की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका में मांगी गई राहत का विरोध करते हुए कहा कि बिना विचार-विमर्श के ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और पूंजी बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी तरह का नया निर्देश जारी करने से इनकार करते हुए याचिका को निस्तारित कर दिया।

