नवरात्रि में अंधविश्वास की हद! नवजात की मौत के बाद माता-पिता ने छूने से किया इनकार

छत्रपति संभाजीनगर। महाराष्ट्र के इस शहर से इंसानियत को झकझोर देने वाली एक बेहद दर्दनाक और हैरान करने वाली घटना सामने आई है, जहाँ नवरात्रि के पवित्र पर्व के दौरान एक निजी अस्पताल में जन्मे मासूम बच्चे की मौत के बाद परिजनों ने घोर अंधविश्वास के चलते उसका अंतिम संस्कार करने से ही साफ इनकार कर दिया। परिवार ने दलील दी कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक और इस काल में मृत शरीर को छुआ नहीं जाता, जिसके चलते उन्होंने अपने ही खून से पूरी तरह दूरी बना ली।

अंधविश्वास की दीवार और संवेदनहीनता की हदें

प्राप्त विवरण के अनुसार, शहर के गजानन मंदिर परिसर में स्थित एक निजी अस्पताल में प्रसव के दौरान एक नवजात शिशु की मृत्यु हो गई। इस दुखद घड़ी में जहां परिवार को दुखी होना चाहिए था, वहीं उनकी आंखों से एक आंसू तक नहीं छलका। परिजनों ने अजीबोगरीब तर्क देते हुए कहा कि नवरात्रि के दिनों में उनके यहाँ बच्चे और प्रसूता को छुआ नहीं जाता है और यदि इस दौरान किसी की मृत्यु हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार भी वर्जित होता है। इस कुप्रथा और अंधविश्वास के आड़े आकर परिवार ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाने से पैर खींच लिए और नवजात के शव को पूरी तरह बेसहारा छोड़ दिया।

श्मशान भूमि के कर्मचारियों ने पेश की इंसानियत की मिसाल

जब परिजनों ने मासूम के अंतिम संस्कार से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया, तब श्मशान भूमि में सेवा देने वाले देवराज गायकवाड़ और रामेश्वर साबले नामक कर्मचारियों ने आगे आकर मानवता का परिचय दिया। वे खुद अस्पताल पहुंचे और अनाथ हुए उस मासूम के शव को अपने सीने से लगाया। संवेदनहीनता का आलम यह था कि बच्चे का पिता श्मशान भूमि तक जाने के लिए कर्मचारियों के दोपहिया वाहन पर बैठने तक को तैयार नहीं हुआ और वह अलग से रिक्शे में बैठकर पीछे-पीछे आया।

खुद गड्ढा खोदकर दी अंतिम विदाई

अस्पताल से लेकर श्मशान घाट तक का सारा सफर और अंतिम विदाई की तमाम औपचारिकताएं उन दयालु कर्मचारियों ने ही पूरी कीं। उन्होंने अपने हाथों से गड्ढा खोदकर बच्चे को सुपुर्द-ए-खाक किया। इस दौरान बच्चे का पिता कुछ दूरी पर तमाशबीन की तरह खड़ा रहा और बाद में केवल रस्म अदायगी के तौर पर बच्चे के ऊपर थोड़ा सा दूध छिड़ककर वहां से चलता बना। नवरात्रि जैसे श्रद्धा और पर्व के पावन दिनों में सामने आई इस घटना ने एक बार फिर आधुनिक समाज में जड़े जमाए बैठे अंधविश्वास और मानवीय संवेदनाओं के पतन पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।

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