नई दिल्ली। वैश्विक स्तर पर तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य और बढ़ते रक्षा बजट के बीच भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने देश की सैन्य आत्मनिर्भरता को अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता करार दिया है। राजधानी में आयोजित प्रतिष्ठित 'दिल्ली डिफेंस डायलॉग 2026' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नौसेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में दुनिया के कई प्रमुख राष्ट्र अपनी सैन्य ताकतों के विस्तार और विभिन्न वैश्विक संघर्षों पर बेतहाशा वित्तीय संसाधन खर्च कर रहे हैं। इस बदलते माहौल में भारत के लिए अपनी सीमाओं की सुरक्षा और परिचालन क्षमताओं के मामले में स्वदेशी तकनीक तथा आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करना बेहद जरूरी हो गया है।
वैश्विक रक्षा खर्च और 21वीं सदी की भू-राजनीतिक चुनौतियाँ
अपने संबोधन के दौरान एडमिरल स्वामीनाथन ने वैश्विक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 2025 में दुनिया भर के देशों ने विभिन्न प्रकार के युद्धों और सैन्य संघर्षों पर कुल मिलाकर लगभग 21.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 20.68 लाख करोड़ रुपये) की विशाल राशि खर्च की है। यह अत्यधिक बड़ा वित्तीय आंकड़ा वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 10.5 प्रतिशत के बराबर है। नौसेना प्रमुख ने रेखांकित किया कि विभिन्न देशों द्वारा हथियारों के भंडार को बढ़ाना और सैन्य युद्धों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होना 21वीं सदी की आधुनिक भू-राजनीति की एक मुख्य प्रवृत्ति बन चुका है, जिसे देखते हुए भारतीय नौसेना को भी अपनी भविष्य की तैयारियों और रणनीतिक भूमिका को लगातार नया रूप देना होगा।
वर्ष 2047 तक पूर्ण आत्मनिर्भरता का विजन
नौसेना प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत के लिए आत्मनिर्भर बनना मात्र एक नीतिगत लक्ष्य नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा से जुड़ी एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता है। उन्होंने नौसेना के दूरगामी विजन का खाका प्रस्तुत करते हुए बताया कि वर्ष 2047 तक भारतीय नौसेना को एक ऐसे आधुनिक बल के रूप में विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो किसी भी बाहरी निर्भरता, विदेशी एजेंसी या अंतरराष्ट्रीय कारकों के दबाव के बिना स्वयं युद्ध लड़ने, उसे लगातार जारी रखने और बदलती परिस्थितियों के अनुकूल अपनी रणनीतियों को ढालने में पूरी तरह समर्थ हो। एडमिरल स्वामीनाथन के अनुसार, भविष्य की जटिल सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय नौसेना को संसाधनों एवं अत्याधुनिक क्षमताओं के स्तर पर पूरी तरह आत्मनिर्भर होना पड़ेगा ताकि उसकी युद्धक क्षमताएं किसी भी विदेशी कारक से प्रभावित न हो सकें।

